Sunday, April 10, 2011

जन लोकपाल विधेयक

१९४७ से अबतक देश में भ्रष्टाचार के इतने मामले जनता के सामने आये हैं की जैसे ही अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के अंत के लिए अनशन का एलान किया सारा देश उनके समर्थन में आगे आ गया। इससे येही प्रतीत होता है की देश की जनता भ्रष्टाचार से कितना अधिक त्रस्त हो गया है। एक उदाहरण है बोफोर्ष घोटाला, २३ वर्ष बीत जाने के बाद भी आज तक उस पर जांच ही चल रहा है। पर आम जनता को लोकपाल विधेयक के उद्देश्य के समबन्ध में अधिक जानकारी नहीं है।
प्रसिध्ध राजनीतिक चिन्तक श्री वेद प्रताप वैदिक जी के विचारों का संक्षेप इस तरह है:-
लोकपाल का अर्थ है, ऐसे पद की स्थापना जो राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सर्बोच्च न्यायाधीश से लेकर छोटे से छोटे सरकारी कर्मचारी के भ्रष्टाचार को पकडे और सजा दिलवाए। इस विधेयक को संसद में पास करने में ४२ साल बीत गए । लेकिन इस पर क्या विवाद हो सकता है की लोकपाल कानून शीघ्रातिशीघ्र बनना चाहिए और उस पर अविलम्ब अमल होना चाहिए। लगभग हर देश यह मानता है की जहाँ शक्ति होगी, वहीँ भ्रष्टाचार होगा। राज्य का काम निगरानी रखना है लेकिन राज्य पर निगरानी रखना भी तो किसी का काम होना चाहिए।
आन्दोलनकारियों का विधेयक निश्चय ही बेहतर है। सरकारी विधेयक मूलतः सरकारी विधिबेत्तयों और अफसरों ने तैयार किया है, जबकि जनलोकपाल विधेयक की तयारी में देश के जाने-माने विधिवेत्तयों, समाजसेवियों, जन्नेतायों, सेवानिवृत अफसरों और न्यायाधीशों ने दिमाग खपाया है। यदि सरकारी भ्रष्टाचार को ख़त्म करने का विधेयक खुद सरकार बनेगा तो वह खुद पर कितनी सख्ती करेगी? अपनी खाल बचने के लिए वह हजार रास्ते निकल लेगी। सरकारी विधेयक में प्रधानमंत्री के प्रतिरक्षा और विदेशी मामलों सम्बन्धी कामों को नहीं छुवा जा सकता है। सांसदों के विरुद्ध यदि भ्रष्टाचार के आरोप लगे तो उनकी जाँच लोकसभा अध्यक्ष की अनुमति के बिना नहीं हो सकती। किसी मंत्री या सत्तारूढ़ दल के सांसद के विरुद्ध क्या किसी अध्यक्ष की अनुमति प्राप्त करना संभव है? इस वैकल्पिक विधेयक में सी बी आई और निगरानी आयोग को लोकपाल के मातहत रखा गया है और लोकपाल को शक्तिसंपन्न बनाया गया है। निश्चित समय में भ्रष्टाचार की जांच करना और दोषियों को दण्डित करना इस जनलोकपाल का काम होगा। इस काम के लिए उसे और उसके सहयोगियों को किसी की अनुमति की जरुरत नहीं होगी। वह पूर्ण स्वायत्त होगा। लोकपाल की नियुक्ति में प्रधानमंत्री, गृहमंत्री तथा विपक्षी नेतायों का कोई हाथ नहीं होगा। यह लोकपाल अपने जाल में नेतायों के साथ-साथ अफसरों और जजों को भी समेट सकेगा।
सरकार का कहना है यह परंपरा संसदीय प्रभुता का उल्लंघन करेगी।
बहरहाल, अनशन अपने आपमें इसलिए स्वागतयोग्य है की इससे देश में भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनजागरण की आंधी उमर सकती है।
इस आन्दोलन का परिणाम क्या हुआ, kya