Friday, December 25, 2015

बेटी बिना घर सूना

छोटी बेटी की भी पिछले माह शादी हो गई ।उसकी बिदाई के दो-तीन दिन बाद बाकी मेहमान भी चले गये।सुबह नींद खुली और आदतन बेटी को आवाज दिया - पर कोई जवाब नहीं मिला... पत्नी उदास सी हँसी के साथ बोली-भूल गले क्या, छोटी भी ससुराल चली गई। अचानक घर बहुत खाली -खाली सा लगा । ऐसा महसूस हुआ जैसे अब तो कुछ करने को रहा ही नहीं ।

Sunday, February 1, 2015

समाधान

रमेश जी हमारे मित्र मंडली में नये-नये शामिल हुए थे।वे एक प्रसिद्ध दवा कंपनी में रिप्रेजेन्टटीभ की नौकरी करते थे और हमारे ही मुहल्ले में एक कमरा लेकर रहते थे।उनके कमरे का एकमात्र खिड़की जिस गली की ओर खुलता था वहाँ से आते-जाते लोग उस खिड़की के आस-पास के जगह को मुत्रालय बना दिया था। रमेश जी रात को थकान से चूर होकर लौटते लेकिन पेशाब की दुर्गंध के कारण रात भर सो नहीं पाते थे।
जब कभी उन्हें अपनी व्यस्त दिनचर्या से फुर्सत मिलता वे हमारे मंडली में शामिल हो जाते और सौगात के तौर पर अक्सर जुकाम, सर दर्द, बुखार आदि की दवायों की फ्री सैम्पल की गोलियाँ दे जाया करते।उन गोलियों के कारण ही हम बेकारी से ग्रस्त लड़कों को गालियां कम मिला करता।
एक दिन रमेश जी अपनी समस्या के समाधान के लिए हम मित्रमंडली के पास आये और चूँकि हम बेकार युवाओं का समय देश-दुनिया की समस्याओं के संबंध में सोचते हुए ही कटा करता इसलिए उनकी समस्या के समाधान के लिए बड़े ही उत्साह के साथ जूट गये।
सबसे पहले उस खिड़की के ऊपर की दिवाल पर चूना से लिखा गया "वो देखो गधा पेशाब कर रहा है"। कुछ भी फर्क नहीं पड़ा। लोगों को गधा कहलाना मंजूर था। फिर वाक्य को बदल कर धमकी भरे वाक्य लिखे  गये " यहाँ पेशाब करने वाले पकड़े जाने पर उससे पचास रूपये दंड लिए जायेंगे"। फिर भी पेशाब करना बदस्तुर जारी रहा। इस समस्या का कोई उपयुक्त समाधान नहीं मिल पा रहा था। हम सभी चिंतित थे।
फिर एक दिन एक मित्र को इस समस्या का स्थायी समाधान मिल गया।
रात को जब मुहल्ले के सभी सो गये तब उस खिड़की के नीचे के और आसपास के सभी जगह को अच्छी तरह साफ किया फिर गोबर और मिट्टी से उसे जगह को लिपा गया।फिर उस स्थान पर पहले से लाया हुआ एक शिवलिंग नुमा पत्थर रखा गया और उसे पत्थर पर लाल सिन्दुर से शिव जी का त्रिपुंड बना दिया गया। पत्थर के पास कुछ फुल और बेल पत्ते रख दिये ग ये और दो-चार अगरबत्तियाॅ जला दी गई। खिड़की के ऊपर लिख दिया गया " ओम् नमः शिवाय"

दूसरे दिन सुबह से ही महिलाएँ लोटे में दुध, फुल-बेल पत्ते और पूजन सामग्री लेकर आने लगे।अब उस जगह पेशाब करने का तो कोई संभावना नहीं था। ऐसा लगा कि समस्या का समाधान हो गया था। लेकिन ऐसा हुआ नहीं वल्कि अब तो समस्या विकराल रूप ले चुका था। एक पंडित जी भी आ गये थे। सुबह पूजा-पाठ हो रहा था और शाम होते-होते शुरू हो जाता भजन-किर्तन। बजने लगते ढोल और झांझर।
आखिर रमेश जी को मजबूरन कमरा छोड़ना पड़ा।उनके समस्या का समाधान नहीं हो पाया।

Thursday, January 1, 2015

नववर्ष में लेखन का प्रारंभ

लगभग दो वष से अधिक समय तक  मन की बातों को लेखन के माध्यम से उजागर नहीं कर पाने का क्षोभ रह गया।इस लंबे अंतराल में ऐसी कई घटनाएँ हुई जिन पर अपने मनोभावों को जाहिर करने के लिए छटपटाता रहा, पर 'नेट' की दुनिया मुझे अपने विचार प्रकट करने की अनुमति नहीं दिया, अथात अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद होने में घंटो लग जाते या होता ही नहीं। प्यारी पुत्री से प्राप्त 'मोबाइल' के माध्यम से अनायास ही अपने विचारों को लेखन के माध्यम से प्रकट कर पाना सहज हो गया।

Saturday, December 31, 2011

कल और आगामी कल

कल जब बीत जायेगा तब हमारे लिए कुछ यादें छोड़ जायेगा। जिसमे से कुछ को हम याद रखना चाहेंगे और कुछ को भूलना। कुछ के साथ तो रहना ही परेगा। जैसे महंगाई, बे-रोजगारी, भ्रस्ताचार, घूसखोरी, बदतमीजी आदि आदि ... फिर भी २०११ के अंतिम दिन अच्छा गुजरे, येही कामना करते हुए उन महान व्यक्तियों को याद करेंगे जिन्होंने अपने गुंणों द्वारा मानवता को खुशियाँ दी। पंडित भीमसेन जोशी, एम्.ऍफ़.हुसेन, उस्ताद रहीम फहीमुद्दीन खान डागर, शम्मी कपूर, नवाब मंसूर अली खान पटौदी, स्टीव जाब्स, जगजीत सिंह, भूपेन हजारिका, हरगोबिन्द खुराना, देव आनंद, कोरिया के शशक किम जोंग इल के साथ साथ विभिन्न प्राकृतिक और अन्य कारोनों से असमय ही इस दुनिया को छोड़ कर चले गए उन्हें भी याद करेंगे। साथ ही उन हादसों को भूलना भी चाहेंगे। भ्रस्ताचार से लड़ना चाहेंगे, सुरुवात हो गयी है इस साल का सबसे अछि बात जब एक मुद्दे को लेकर पूरा देश एकमत हुआ और एक नयी सुरुवात हो गयी। दुनिया के कई अन्य देशों में भी अन्याय के खिलाफ आन्दोलन हुआ और जनता की जीत हुई। २८ साल बाद हमारा देश फिर एक बार क्रिकेट का वर्ल्ड कप जीत कर लाया। ११ मार्च जापान में सुनामी नमक हादसे के बाद सारा देश बर्बादी के कगार पर था, लेकिन जापानी एक बार फिर अपने को साबित किया और वरस बीतने नहीं पाया जापान जैसा था उससे भी ज्यादा सुन्दर हो गया, जैसे प्रकृति को मानव कहा रहा हो की चाहे तुम चाहे जितनी बार हमें गीरायो हम फिर उठ खड़े होंगे। हजारों या शायद लाखों का हत्यारा, मानवता का दुश्मन ओसामा बिन लादेन को मार डाला गया। इस वर्ष कुछ इमानदार लोगों के कारन कई भ्रष्ट्राचार उजागर हुए . भ्रष्ट्राचार के आरोप में कई शक्तिशाली नेतायों को जेल जाना पड़ा। कई मुद्दों पड जनता अपनी विरोध जताया। कई नई कानून बनाने के लिए संसद पर दवाव बनाया गया। भ्रष्ट्राचार के अंत के लिए 'लोकपाल विधेयेक पारित करने को कहा गया और वोह शायद पारित हो भी जाएगी। लेकिन ये सरकारी विधेयक होगी क्योंकि जनता के कम ही मांगो को ध्यान में रखा गया है। इस विधेयक के अधिकतर बिंदु उनके सुबिधा के लिए छोड़ दिए गए हैं। जिसमे से एक अहम् मांग थी सी बी आई को स्वंत्र संगठन बनाया जाना। जो किसी मंत्रालय के अधीन नहीं रहेगा। अन्ना जे का ये आन्दोलन सभी को याद रहेगा। जब देश के बच्चे बच्चे ने कहना सुरु किया मई भी अन्ना। बाकि फिर कभी..........

Friday, December 30, 2011

उन्हें पता नहीं की उन्हें कुछ नहीं पता

वे हमें बताते हें , की
क्या करना चाहिए,
क्योंकि
वे माननीय हैं,
भूलते हैं वे, की
हमने ही बनाया था उन्हें, 'माननीय'
वे हमें बताते हैं, की कौन सी दवा
हमारे सेहत के लिए ठीक है
और कौन सी नहीं
हमें स्वस्थ रहने के लिए
'योगा'
करना चाहिए की नहीं
किसे योग विद्या आती है, किसे नहीं,
कितने निर्लज्ज हैं वे?
जो हमारे ही द्वारा बनाये गए है, और
हमारे ही कारन ऐश की जिदगी जी रहे हैं
क्या उन्हें ये शोभा देता है?
उन्हें ये पता होना चाहिए था
की
उनकी अकर्मण्यता, काहिली
निर्ल्ज्ज़ता, chatukarita और बरबोलापन
के कारण दिनों दिन गरीबी, बेरोज़गारी, महंगाई
सुरसा की तरह बढ़ता ही जा रहा है
ऐसी किसी बात पर
वे कुछ भी नहीं बोल पते
और बोलते भी हैं
तो बकवाश करते हैं।
कभी कभी तलवे चाटने
से उन्हें फुरसत
मिल जाए, तो फिर उनसे
पूछा जायेगा की
उनकी उपलब्धि कमसे कम itni to hai
की लोग उन्हें पूजा करते है
क्योंकि उनसे उन्हें मिला है जीवन को निरोग जीने की कला
आपसे क्या सिख पाया आम जनता
अबतक आपने मानव कल्याण के लिए क्या किया?
इश्वर न करे,
आप जब दिवंगत होंगे
तो आपको याद करने वाला कितने होंगे
और
यदि उन्हें कुछ हो गया तो?
लोग उन्हें आगामी वर्षों याद रखेंगे,
इसलिए हुजुर
जरा सोचिये
और बकवाश न करके,
जिसके लिए,
आप माननीय हैं
उनके लिए ,
कुछ ऐसा कीजिये
ताकि लोग आपको भी वर्षों याद रखें!!.

Wednesday, December 21, 2011

डीसेक्सन बॉक्स

नवीं श्रेणी में पढ़ रहा था। विज्ञानं पढने की तमन्ना थी। जीव विज्ञानं के शिक्षक महोदय हम सभी को मेढक के शारीरिक अंदरूनी संरचना का प्रायोगिक पाठ पढाया और इस प्रयोग को अपने से करने के बाद उसे लिखकर लाने का गृह कार्य दिया। इस प्रयोग को करने के लिए ' डिसेक्सन बॉक्स ' (जिस बॉक्स में विभिन्न तरह के औजार रहते हैं और जिसके द्वारा छोटे-छोटे जानवरों और कीट-पतंगों की शल्यक्रिया के माध्यम से उनकी अंदरूनी शारीरिक संरचना के सम्बन्ध में जानकारी ली जाती है ) की आबश्यकता थी और मेरे पिता जी की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी की पचास-पचपन रुपये में इस बॉक्स को खरीदकर मुझ भबिश्य के वैज्ञानिक को देते। मैं इस बात को जानता था इसलिए अपने पिताजी से तो यह नहीं कहा सका पर मेरी सभी समस्यायों का हल मेरे माँ के पास हमेशा उपलब्ध रहती थी। इस समस्या को भी उनके पास रखा। उन्होंने कहा "यदि तुम्हे प्रयोग करना है, तो इसके लिए तुम्हे प्रयास करना होगा और निश्चित ही तुम्हे कोई न कोई उपाय भी मिल जायेंगे , बस प्रयास इमानदारी से करो " आगे उन्होंने यह भी कहा की उन महान बैज्ञानिको को याद करो जिन्होंने तुमसे भी अधिक आर्थिक रूप से कमजोर रहते हुए भी कई महान अविष्कार किये थे" उनके कथन से मुझे वल मिला और मैं अपने प्रयोग के लिए अबश्यक सामान जुटाने में लग गया।

घर से ही एक पुराना लकड़ी का टुकड़ा जिस पर कभी कांच का टुकड़ा लगा था और वह आइना हुआ करता था मेरे आगामी प्रयोग के लिए सब्जेक्ट को रखने का आधार बना। लोहे की पत्ती के एक छोटे टुकड़े को चिमटे का आकार दिया गया, जिससे सब्जेक्ट को पकड़ना था। अपने टिफिन के पैसे से बचाए हुए छे पैसे और माँ से मांगी गयी चार पैसे कुल दस पैसे यानी दो आने दो पैसे में बाज़ार से एक छोटी कैंची ख़रीदा गया, जिसके द्वारा सब्जेक्ट को काटना था। अब सब्जेक्ट को बेहोश करने के लिए स्प्रिट (जैसा के पुस्तक में लिखा था) की व्यवस्था करनी थी। एक मित्र के पिताजी की दावा दुकान थी जहाँ से मित्र ने एक छोटी शीशी में दुकान से अपने पिताजी की नज़र चुराकर स्प्रिट और थोड़ी सी मात्रा में रुई की व्यवस्था भी कर दिया। अब केवल एक डब्बे की जरुरत थी जिसमे सब्जेक्ट को रखकर बेहोंश करना था जो की घर पर ही आसानी से उपलब्ध हो गया और सब्जेक्ट यानी मेढक जो आँगन के आस-पास सैकड़ों की संख्या में उपलब्ध था।
रात भर ठीक से सो नहीं पाया। सुबह प्रयोग करना था। सुबह उठकर डब्बे में स्प्रिट से भीगी हुई रुई लेकर मैंने मेढकों के निवास पर गया और एक मेढक को जबरदस्ती उस स्प्रिट भीगी हुई रुई जो की डब्बे में था में जाने को विवश कर दिया। उसके अन्दर जाते ही डब्बे के ढक्कन को बंद किया और एक से सौ तक गिन लिया फिर भी निश्चिंत होने के लिए और पचास तक भी गिन लिया ताकि मेढक के बेहोश होने में कोई शक न रहे। एकसौ पचास की गिनती (जो की धीरे धीरे गिना गया था और इतने समय में शायद दो सौ भी पार हो जाता ) के बाद जब ढक्कन को खोला गया तो मैंने पाया की सब्जेक्ट पूरी तरह बेहोश हो चूका था और अब वह मेरे प्रयोग के लिए बलिदान देने को तैयार हो गया था।

अब मैं प्रयोग करने के लिए मानसिक रूप से तैयार होकर बैठ गया। क्योंकि घंटे दो घंटे में प्रयोग के निष्कर्ष को कागज़ में उतार कर स्कूल में ले जाना था, अन्यथा जगदीश सर की छड़ी..... बाप रे बाप...... याद आते ही आज भी कंपकंपी आ जाता है। मानसिक रूप से तयारी इसलिए भी करनी थी क्योंकि जीवन में पहली बार किसी जीवीत वस्तु पर छुरी यानि कैंची चलने जा रहा था। इस कार्य के लिए बारह वर्ष का उम्र उस ज़माने के लिए अत्यंत ही कम था।

बेहोंश मेढक को डब्बे से निकाल कर लकड़ी के तख्ते पर पीठ के बल लिटाया, जी हाँ पुस्तक के अनुसार, पुस्तक को खोलकर उसके प्रायोगिक पृष्ठ को सामने रख लिया था। फिर सब्जेक्ट के अत्यंत नरम चमड़े को चिमटे से पकड़कर जरा सा उठाया और कैंची को सावधानी से चमड़े के अन्दर लगते हुए धीरे-धीरे काटना शुरू किया। चमड़े को तीन तरफ से बर्फी के आकार में काट कर पुरे पेट को खोल दिया, साथ ही मेरे सामने पहली बार किसी जीवित वस्तु के अंदरूनी संरचना खुल गयी और मैं हतप्रभ होकर कुछ देर तक तो केवल देखता ही रह गया। ऊँगली के नाख़ून का एक चौथाई आकार का छोटा सा दिल और उतनी ही छोटी सी फेफड़ा। चारो और फैली असंख्य रक्त नलिकाएं आदि-आदि। मैं जल्द से जल्द पूछे गए प्रश्न के अनुसार देखे गए सभी संरचानायों को कागज़ पर उतारता गया। कुछ ही देर में मेरा प्रायोगिक कार्य का अंत हो गया। अब बारी थी सब्जेक्ट को फिर से होंश में लाने की। घर से सुई-धागे मैं लेकर ही आया था। कच्चे हनथो से मैंने फिर से सब्जेक्ट के चमड़े को सी दिया।

लेकिन प्रयोग के दौरान एक गलती हो ही गई थी जिसके लिए मैं आज तक खुद को माफ़ नहीं कर सका।

सब्जेक्ट के सामने के पैरों में से एक पैर की नाजुक सी हड्डी को हाँथ कांप जाने के कारन काट डाला था। बचपन की अबूझ बुध्धि से अपने तै उसे भी ठीक करने का प्रयास किया था, यानी हड्डी को भी धागे से सख्ती से बाँध दिया था और सब्जेक्ट के होंश में आने तक प्रतीक्षा करता रहा था। फिर उसे उसके निवास स्थान तक सावधानी से पहुंचा दिया था। उसकी स्थिति कैसी है ? इस चिंता में स्कूल का समय किसी तरह से काटा। हांलाकि जगदीश सर से काफी प्रशंशा मिला था, क्योंकि मेरा प्रायोगिक विवरण क्लाश में सबसे अच्छा हुआ था। उन्हें मेरी आर्थिक स्थिति की जानकारी थी, इसलिए उन्होंने मुझे सभी से प्रयोग करने और उसके लिए अबश्यक यंत्रो को मैंने कैसे जोगद लगाया था उसका विवरण देने को भी कहा था। सभी मित्रों के लिए मैं एक उदाहरन बन गया था। फिर भी मुझे ख़ुशी से अधिक चिंता सता रही थी की मेरे सब्जेक्ट की स्थिति न जाने कैसी है। क्या वोह फिर से चल रहा होगा? आसानी से कूद प् रहा होगा?
स्कूल से लौट कर मेढकों के रहने की जगह पर गया, जहाँ सब्जेक्ट को मैंने छोड़ा था। उसकी स्तिथि देख कर मुझे रोना आ गया। वह घिसट रहा था। उसके सामने का एक पैर अब किसी काम का नहीं रहा था। वह जिन्दा था और बाकि तीन पैरों पर चलने की कोशिश कर रहा था। यानि घिसट रहा था। मैं अन्दर ही अन्दर कांप सा गया और उसको जिन्दा रखने के लिए क्या कर सकता हूँ सोंचने लगा। कुछ छोटे-छोटे कीड़ों को पकड़कर उसके सामने रखा। भूखा तो वोह था ही एक जगह पड़े पड़े कितना शिकार कर पाता? जल्द ही उसने उन कीड़ों का भोजन करने के बाद अपने गोल-गोल आँखों से देखा जैसे कह रहा हो की तुमने मुझ पर कोई उपकार नहीं किया ये तो तुम्हारा कर्त्यब्य था। अब उसे सहारा देकर वहां से उठाया और छाहँ में रख दिया। ऐसा लगा जैसे उस जीव को अपने प्रयोग के स्वार्थ के लिए उपयोग करके बहुत बड़ा अन्याय किया था। अब उसे थोड़ी सी आराम देकर कुछ शांति मिला। तै कर लिया की अब उसके भोजन की व्यवस्था मैं ही करूँगा। दो-चार दिन उसे उसी जगह पर ईमानदारी से भोजन देता रहा था लेकिन एक दिन उसे वहां पर नहीं पाया। धीरे-धीरे मैं उसे भूलने लगा था। लेकिन एक दिन खेलते हुए उसी जगह पर पहुँच गया जहाँ से मैंने उसे प्रयोग करने के लिए पकड़ा था। देखा ! कि चाहरदीवारी के नीचे एक बिल के बाहर वह पड़ा हुआ था और एक दूसरा मेढक छोटे-छोटे कीड़ों को पकड़कर उस तक पहुंचा रहा था। मैं देखता ही रह गया।

Sunday, September 11, 2011

चर्चा ज्वलंत मुद्दों पर

इन दिनों 'भ्रष्टाचार' और उसके सहोदर 'राईट टु रिकॉल और राईट टु रिजेक्ट' मुद्दों पर देश भर में आम आदमी से लेकर तथाकथित ख़ास व्यक्तित्यों में चर्चाएँ छिड़ी हुई हैं। ऐसा लगता ही नहीं वल्कि विश्वाश होने लगा है की देश के सभी लोग उपरोक्त मुद्दों पर कानून बनाने के लिए संसद को वाध्य करके ही दम लेंगे। मेरे मन में सवाल ये आ रहा है की 'भ्रष्टाचार' की परिभाषा क्या है ? यदि इस शब्द को परिभाषित किया जाये तो .....

" बंगला भाषा में एक कहावत है 'ठग बाछते गावं उजाड़' यानि जब आप गावं में ठग चुनने निकलेंगे तो शायद ये पाया जय की गवां के सभी लोग ठग हैं।

'भ्रष्टाचार की पारिभाषिक अर्थ के अनुसार 'सौ में निन्यानाब्बे बेईमान फिर भी भारत महान'। आज जिन्हें हम भ्रष्टाचारी कह रहे हैं, उन्हें हमने ही चुन कर संसद में भेजा था। ये अलग बात है की उन्हें चुनने के पीछे हमारी मंशा कुछ और थी और उनकी मंशा कुछ और....

कल एक अति वृद्ध शिक्षक महोदय से बातें हो रही थी, उनका कहना था की 'ये घूसखोरी या भ्रष्टाचार कोई नयी तो है नहीं, मैं १९५२ में जब एक मिडिल स्कूल का हेडमास्टर था उस समय भी हम शिक्षकों को समय पर वेतन पाने के लिए प्रति माह २५ रुपये देने पड़ते थे।

चलिए फिर से आते हैं उसी विषय पर की यह कानून लागू करेगा कौन ? जाहिर सी बात है, की यह कानून जिनके या जिन लोगों पर लागू होने की संभावना अधिक है, वे ही इस कानून को बनायेंगे भी, फलस्वरूप वे पुरजोर कोशिश करेंगे की यह कानून लागू नहीं हो या हो भी तो इसमें इतनी पेंच हो की उन पर कोई आंच नहीं आ पाए।