मैं हिंदी ब्लॉग की दुनिया में नया हूँ। इसलिए जिन सुधिजनो द्वारा मेरा ब्लॉग पढ़ा जा रहा है उनसे अनुरोध है की कृपया मुझे उस प्रक्रियायों के सम्बन्ध में बताएं जिससे मैं आपके ब्लॉग को पढ़ सकूँ और हिंदी में उस पर अपनी विचार व्यक्त कर सकूँ। अभी-अभी मैंने पाया की मेरे ब्लॉग लेखन को कई लोगों ने पढ़ा है। मुझे उत्साहित करने के लिए कोटिश धन्यवाद।
मैं भी अन्य आम भारत्बसियों जैसा ही अत्यंत कठिनाइयों भरी संघर्षमय जीवन बिताना परा है और जाहिर है की मुझे भी अच्छी और कटु अनुभवों से गुजारना परा है। फिर भी मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है, क्योंकि मैं यह मानता हूँ की दुःख के बिना सुख का अनुभव नहीं किया जा सकता। शुक्र है की मुझे अच्छे लेखकों की साहित्यिक पुस्तकें पढने के नशा है। शायद इसीलिए जीवन के संघर्ष में भी मुझे ख़ुशी ढूढने में आसानी हुई।
आप सभी के मार्गदर्शन की आशा में।
warshon beet gaye aadmi 'aadmi' nahi ban paya. janwar bhi aisi harkat nahi karte jaisa ki aadmi kar lete hai. aasam ki ghatna udaharan matra hai.
Friday, October 29, 2010
Monday, October 25, 2010
अंतर शब्दों का
वह अपनी बहन के विवाह के लिए लड़के के माता-पिता को बहन के सम्बन्ध में बता रहा था-
मेरी बहन बहुत ही सुंदर, गोरी, कद लम्बी और स्वाश्थ्य छरहरी है। ग्रेजुयेसन कर चुकी है. घर के सभी कार्य में कुशल हैं। अभी उम्र केवल इक्किश वर्ष है। आपके लड़के के लिए सर्बथा उपयुक्त होगी, दावे के साथ कहा सकता हूँ।
रेड एरिया का एक दलाल किसी ग्राहक से एक लड़की के सम्बन्ध में बता रहा था-
चलिए न साहब, एक दम कमसिन कलि है। खुबसूरत, गोरी, laम्बी और मॉडल जैसी छरहरी बदन है। अंग्रेजी में बात करना भी जानती है. आपको खूब पसंद आएगी.
मेरी बहन बहुत ही सुंदर, गोरी, कद लम्बी और स्वाश्थ्य छरहरी है। ग्रेजुयेसन कर चुकी है. घर के सभी कार्य में कुशल हैं। अभी उम्र केवल इक्किश वर्ष है। आपके लड़के के लिए सर्बथा उपयुक्त होगी, दावे के साथ कहा सकता हूँ।
रेड एरिया का एक दलाल किसी ग्राहक से एक लड़की के सम्बन्ध में बता रहा था-
चलिए न साहब, एक दम कमसिन कलि है। खुबसूरत, गोरी, laम्बी और मॉडल जैसी छरहरी बदन है। अंग्रेजी में बात करना भी जानती है. आपको खूब पसंद आएगी.
Thursday, October 14, 2010
aadmi se kutta bhala
पडोश के दोस्त के पास एक तगर देशी कुत्ता था। घर के सामने एक छोटा सा खुला जगह था जहाँ मेरा दोस्त सब्जिय उगता था। और उसके पहरेदारी करता था वह कुत्ता। समय के साथ साथ कुत्ता बुध हो गया साथ ही उसके प्रति दोस्त का प्यार भी सायद घाट चूका था। जो भी हो अब उस कुत्ते को भरपेट खाना भी नहीं जुटता था। तबतक एक कम उम्र का जवान कुत्ता आ चूका था। उसका देख भाल खाना पीना पर दोस्त काफी ख्याल रहता था।
एक दिन दोस्त की बहन आँगन में खुली चूल्हे पर रोटियां सेंक रही थी। दोनों कुत्ता पास ही बैठ कर रोटियों को ललचाई दृष्टि से देख रहा था।बुड्डा कुत्ता जानता था की उसे शायद ही गरम गरम एक रोटी मिल जाये।पोलिना एक गरम रोटी सेंक कर कुत्तों के तरफ उछाला जवान कुत्ता ने उसे उठाया और बुड्डे कुत्ते के पास जाकर रख आया। क्योंकि उसे पता था की दूसरा रोटी उसे निश्चित ही मिलेगा।
मैंने दोस्त से कहा अभी क्या हुआ देखा? वह इस घटना पर ध्यान नहीं दिया था। इसलिए मैंने साडी घटना को उसे बताया। उसने आश्चर्य भरी नज़रो से देख कर केवल इतना ही कहा- शंकर , यार आदमी से कुत्ता भला।
एक दिन दोस्त की बहन आँगन में खुली चूल्हे पर रोटियां सेंक रही थी। दोनों कुत्ता पास ही बैठ कर रोटियों को ललचाई दृष्टि से देख रहा था।बुड्डा कुत्ता जानता था की उसे शायद ही गरम गरम एक रोटी मिल जाये।पोलिना एक गरम रोटी सेंक कर कुत्तों के तरफ उछाला जवान कुत्ता ने उसे उठाया और बुड्डे कुत्ते के पास जाकर रख आया। क्योंकि उसे पता था की दूसरा रोटी उसे निश्चित ही मिलेगा।
मैंने दोस्त से कहा अभी क्या हुआ देखा? वह इस घटना पर ध्यान नहीं दिया था। इसलिए मैंने साडी घटना को उसे बताया। उसने आश्चर्य भरी नज़रो से देख कर केवल इतना ही कहा- शंकर , यार आदमी से कुत्ता भला।
Tuesday, October 12, 2010
राष्ट्रभाषा hindi
१५ सितम्बर से ३० सितम्बर तक सभी सरकारी कार्यालयों में हिंदी पखवारा मनाया जाता है। कार्यालय के सभी कार्य हिंदी में करने के लिए कर्मचारियों को प्रोत्साहित करने के लिए यह कार्यक्रम वर्षो से किया जा रहा है। हिंदी भाषी राज्यों में भी हिंदी को प्रोत्साहित करने के लिए इस पखवारा आयोजन किया जाता है। मुझे आश्चर्य इस बात का है की हिंदी भाषी राज्यों में जहाँ सभी की मातृभाषा हिंदी है, में भी हिंदी को प्रोत्साहित करने की आबश्यकता है? यह प्रोत्साहन यदि दुसरे भाषाई राज्यों के लिए हो तो उसका कुछ औचित्य भी हो सकता है। उदाहरनार्थ बंगाल, उरिश्या या दक्षिण के राज्यों में हिंदी की प्रोत्साहन के लिए इस कार्यक्रम का औचित्य है। इस पखवारे के दौरान हिंदी में कार्य करने के लिए सख्त निर्देश जारी किया जाता है। फिर भी बड़े पदाधिकारी अंग्रेजी में ही सभी कार्य करते हैं। पखवारे के अंतिम दिन समापन समारोह का कार्यक्रम में कीच प्रतियोगिता का भी आयोजन होता है जिसमे पुरष्कार राशी का बितरण होता है। केबल पुरस्कार राशी प्राप्त करने के लिए उस दिन प्रतियोगी हिंदी में लिखते हैं और जाहिर है की अच्चा ही लिखते हैं। हिंदी भाषी राज्यों के सरकारी कार्यालयों में तो फिर भी ९० प्रतिशत कार्य हिंदी में होता है पर केंद्र सरकार के कार्यालयों में तो शायद ही २० प्रतिशत कार्य हिंदी में होता है। हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी का यदि यह हाल है तो अन्य भाषाई राज्यों में हिंदी की स्तिथि का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। वर्षों से, हिंदुस्तान में, जहाँ का राष्ट्रभाषा हिंदी है, को प्रोत्साहित करने के लिए lakhon की राशी खर्च की जाती है बावजूद आज भी अंग्रेजी भाषा के सामने हमारी राष्ट्रभाषा की स्तिथि दोयम दर्जे का ही रह गया है। क्या यह शर्म की बात नहीं ? दुनिया के अन्य देशों के राजनेता जब कभी हमारे देश में आते है और किसी भी तरह के भाषण या विचार व्यक्त करते है तो अपनी ही भाषा का प्रयोग करते है और अनुवादक उस भाषा को हिंदी य अंग्रेजी में अनुवाद करते रहते हैं। जबकि हमारे देश के राजनेता अन्य देशों में जाकर हिंदी नहीं वल्कि अंग्रेजी भाषा में बात करना अपनी शान समझते है। जबकि वहां भी अनुवादक उपलब्ध रहता है। इसीलिए उच्च वर्ग के तथाकथित विद्वानों के लिए हिंदी अनपढ़ और गवांरो की भाषा बनकर रह गया। जिस देश के प्रबुध वर्ग और राज्नेतावों को हिंदी बोलने में संकोच और शर्म महसूस होता हो वहां के आम जनता से क्या आशा किया जा सकता है। आज के युवायों को क्या दोष दिया जाये, उन्हें अपने करियर के लिए अंग्रेजी सीखना और इस भाषा में पारंगत होना ही पड़ता है. उन्हें क्या पता की एक सुनियोजित षडयंत्र के तहत राष्ट्रभाषा हिंदी को किनारे करते हुए अंग्रेजी भाषा का महत्व दिया जाता रहा। मुझे अंग्रेजी भाषा से कोई शिकायत नहीं है । मैं यह मानता हूँ की अंग्रेजी सीखना आवश्यक है, पर राष्ट्रभाषा से अधिक महत्व में इसे कभी नहीं दे सकता। हम हिंदी में हँसते है, रोते है, अपने सभी मनोभावों को हिंदी में ही प्रकट करते है, फिर भी अपने को बिद्वान और पढ़े लिखे दिखने के लिए अंग्रेजी में बात करना अपनी शान समझते है। जबकि अंग्रेजी एक सहज भाषा है और थोड़ी सी प्रयास से ही इस भाषा को आसानी से सिखा जा सकता है। मैं अपने आस पास के ऐसे कई व्यक्ति को जनता हूँ जिनका प्रारंभिक शिक्षा हिंदी में ही हुई है पर आज वे ही कहते हैं की यार ये हिंदी मेरे समझ में नहीं आता। अंग्रेजी में लिखा होता तो आसानी से इसका अर्थ बता सकता हूँ। इस तरह के लोग मेरे नज़र में राष्ट्रद्रोही हैं। चाहे वह कोई भी क्यों न हो। जिन्हें अपने राष्ट्रभाषा पर गर्व न हो उसे अपने देश पर गर्व नहीं हो सकता। राष्ट्रभाषा का उन्नति पर ही देश की उन्नति निर्भर हो सकता है।
Monday, October 11, 2010
लक्ष्य को पाने का junun
आज सुबह का समाचार पढ़ कर बहुत दिनों के बाद बेहद ख़ुशी महसूस किया।
हमारे शहर रांची के एक अत्यंत साधारण गरीब परिवार की लड़की दीपिका Commenwealth गेम्स के तीरंदाजी के एकल स्पर्धा में भी स्वर्ण जीत कर केवल इस शहर का ही नहीं पुरे राज्य, देश और अपने परिवार का नाम रौशन कर दिखाया। १७ वर्ष की इस लड़की के जूनून को संपूर्ण अंतर्मन से "शाबाश दीपिका" कहता हूँ। साथ ही उसके माता-पिता को भी पुरे दिल से नमस्कार कहना चाहता हूँ, अपनी पुत्री को आगे ले जाने में उनका त्याग और योगदान लाखों माता- पितावों को प्रेरणा देने में सहायक होगा। साथ ही उन लड़के-लड़कियों को भी यह सिख मिलेगा की लक्ष्य को हासिल करने के लिए यदि जूनून हो तो कोई गरीबी या धन की कमी आड़े नहीं आ सकता।
एन0 रघुरमण के कथनानुसार राष्ट्रमंडल खेलों में शिरकत करने वाले भारतीय खिलाडियों में से ९० प्रतिशत खिलाडी निम्न मध्य वर्ग या निम्न आय वर्ग से आते हैं। खेल सुविधायों का पुर्णतः अभाव और तमाम मुश्किलों के बावजूद ये खिलाडी सिर्फ खेल के प्रति अपने जूनून और समर्पण के बल पर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्टार तक पहुंचे है। काश हमारी सरकार इन्हें वे सुविधाएं और प्रोत्साहन देते तो ओल्य्म्पिक में भी ये होनहार खिलाडी निश्चित ही स्वर्ण पदक का अम्बार लगा सकतें हैं। जय हो जूनून और समर्पण की।
हमारे शहर रांची के एक अत्यंत साधारण गरीब परिवार की लड़की दीपिका Commenwealth गेम्स के तीरंदाजी के एकल स्पर्धा में भी स्वर्ण जीत कर केवल इस शहर का ही नहीं पुरे राज्य, देश और अपने परिवार का नाम रौशन कर दिखाया। १७ वर्ष की इस लड़की के जूनून को संपूर्ण अंतर्मन से "शाबाश दीपिका" कहता हूँ। साथ ही उसके माता-पिता को भी पुरे दिल से नमस्कार कहना चाहता हूँ, अपनी पुत्री को आगे ले जाने में उनका त्याग और योगदान लाखों माता- पितावों को प्रेरणा देने में सहायक होगा। साथ ही उन लड़के-लड़कियों को भी यह सिख मिलेगा की लक्ष्य को हासिल करने के लिए यदि जूनून हो तो कोई गरीबी या धन की कमी आड़े नहीं आ सकता।
एन0 रघुरमण के कथनानुसार राष्ट्रमंडल खेलों में शिरकत करने वाले भारतीय खिलाडियों में से ९० प्रतिशत खिलाडी निम्न मध्य वर्ग या निम्न आय वर्ग से आते हैं। खेल सुविधायों का पुर्णतः अभाव और तमाम मुश्किलों के बावजूद ये खिलाडी सिर्फ खेल के प्रति अपने जूनून और समर्पण के बल पर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्टार तक पहुंचे है। काश हमारी सरकार इन्हें वे सुविधाएं और प्रोत्साहन देते तो ओल्य्म्पिक में भी ये होनहार खिलाडी निश्चित ही स्वर्ण पदक का अम्बार लगा सकतें हैं। जय हो जूनून और समर्पण की।
Sunday, October 3, 2010
दामाद
-नमस्ते दीदी, सब ठीक हैं न? ये अभी अंदर कौन गए? दामादजी थे क्या ?
-हाँ दीदी, दामादजी ही तो थे। किसी की नज़र न लगे, मेरा दामाद तो हीरा है हीरा। देखिये मेरे और उनके लिए दवा लाना था और सब्जी भी। दामाद जी को एक फ़ोन किया और सारा सामान घर पर आ गया। जब भी कोई जरुरत होता है तो उन्हें फ़ोन करते ही आ जाते है।
- बहुत अच्छी बात है दीदी। लेकिन मनु बेटा को नहीं देख रही हूँ। घर पर नहीं है क्या ? आज तो छुट्टी है न?
- मत कहिये दीदी, मेरा बेटा तो नालायक, कुलांगार है। जब देखो ससुराल में ही पड़ा रहता है, और वहां का काम करता रहता है।
-हाँ दीदी, दामादजी ही तो थे। किसी की नज़र न लगे, मेरा दामाद तो हीरा है हीरा। देखिये मेरे और उनके लिए दवा लाना था और सब्जी भी। दामाद जी को एक फ़ोन किया और सारा सामान घर पर आ गया। जब भी कोई जरुरत होता है तो उन्हें फ़ोन करते ही आ जाते है।
- बहुत अच्छी बात है दीदी। लेकिन मनु बेटा को नहीं देख रही हूँ। घर पर नहीं है क्या ? आज तो छुट्टी है न?
- मत कहिये दीदी, मेरा बेटा तो नालायक, कुलांगार है। जब देखो ससुराल में ही पड़ा रहता है, और वहां का काम करता रहता है।
जब कोई परिवार अपने सुयोग्य पुत्र के लिए जीवनसंगिनी की खोज करते हुए धन की भी खोज जारी रखता है ताकि उस सुयोग्य पुत्र को अधिक से अधिक दाम में बेचा जा सके तब उस परिवार के शिक्षित होने पर संदेह होता है अ संदेह इस बात का भी होता है की उस परिवार के माता-पिता को अपने सुयोग्य पुत्र की योग्यता पर भी संदेह है की वह स्वाबलंबी होकर भी इतना अयोग्य है की वह अपनी पत्नी के लिए जरुरत की बस्तुएं ला नहीं सकता। उसे खुद को बेचकर भी धन चाहिए ताकि आगामी भबिश्य में वह अपनी पत्नी को भोजन, कपरे, कार और घर की ब्यबस्था कर सके। यदि हमलोग अपने बच्चो को शिक्षित बनाकर भी अप्रत्यक्ष रूप से भिखारी बनाना चाहते है? उसके योग्यता पर प्रश्नचिंह लगाना चाहते हैं, तो फिर इस दहेज़ रूपी अभिशाप से हमें कभी भी मुक्ति नहीं मिल सकता। भले ही हमलोग इसके लिए कोई भी तर्क प्रस्तुत करते जाये, सच यही है हम जन बुझ कर एक शिक्षित समाज में शिक्षित और स्वाबलंबी पुत्र और पुत्रियों को हाथ पसारना ही सीखा रहे हैं। काश आज के जवान लड़को को अगर इतना आत्मसम्मान होता तो शायद दहेज़ का भी अंत हो जाता।
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