Thursday, November 11, 2010

पानी

मई- जून का माह था सुबह नौ बजे से सेना के पांच सौ जवान अपनी रायफल और अन्य साजो सामान के साथ, दो किलोमीटर के दायरे में मार्च कर रहे थे भीषण गर्मी और अत्यधिक वजन के कारण सभी थक चुके थे प्यास से सभी का कंठ सुख चूका था और वे इस प्रतीक्षा में थे की कब प्लाटून कमांडर का आदेश मिले और वे अपनी सूखे हुए गले को तर कर सके दो घंटे के कठिन मार्च के बाद, सवा फीट ऊँचे विशाल कद काठी के प्लाटून कमांडर ने, सभी जवानों को व्हिसल बजा कर, पानी पीने के लिए केवल पांच मिनट का समय दिया और खुद पेड़ के नीचे बिछे कुर्सी पर बैठ कर ठन्डे सुराही में से पानी पीने लगा ।
मैदान
के आखरी किनारे पर पांच-सात टंकियां रखी हुई थी, व्हिसिल का आवाज सुनते ही सभी जवान टंकियों की ओर दौड़ पड़े। टंकी में लगी हुई रबड़ के पाईप को होंठो से लगा कर जितनी जल्दी हो सके दो-चार घूंट पानी पीने से पहले ही कोई दूसरा उस पाईप को छीन ले रहा था, फलस्वरूप किसी का भी प्यास पूरी तरह मिट नहीं रहा था।
बिजय सिंह बेहद थका हुआ था। शारीरिक और मानसिक रूप से भी। घर से पत्र आया था। माँ और एक मात्र बच्चा वीमार है, कुछ दिन पहले तूफ़ान आया था, घर का छप्पर उड़ गया था। पत्नी किसी तरह ताड़ के पत्तों से छप्पर का बंदोबस्त कर लिया है पर दवा के लिए पैसे नहीं है, गावं के वैद्य जी मेहरबानी करके अभी भी उधार में दवा दे रहें हैं, इस भरोसे के साथ की जब वह घर लौटेगा तो उनके बकाया को दे देगा। फिर भी वीमारी ठीक नहीं हो रहा है... आदि-आदि। वह सोच रहा था की भीड़ थोडा घट जाये तो वह भी दो घूंट पानी पी लेगा।
अभी शायद एक-डेड मिनट ही बचे होंगे। बिजय टंकी के पास जाकर पानी पीने ही वाला था की व्हिसिल बज गया, फिर प्लाटून कमांडर का कड़क आवाज सुनाई दिया "फलो ऑन जवानों " सभी जवान दौड़ते हुए लाइन में लगने लगे।
अत्यधिक प्यास के कारण बिजय कमांडर के आदेश को सुना-अनसुना करते हुए पानी पीने के लिए जैसे ही पाईप को होंठो से लगाया था की उसके हाँथ से पाईप छुट गया था और वह जमीन से छः इंच ऊपर उठ गया था।
विशाल शारीर के बेहद ताकतवर कमांडर, उसे एक छोटे जानवर के बच्चे जैसा गर्दन से पकड़कर उठा लिया था और जमीन पर रखते हुए गलियां देते हुए कह रहा था " शाले... ,...! .... मैं कह रहा हूँ... लाईन में लगो, तेरे को सुनाई नहीं देता ?"- " साहब, दो घूंट पी लेने दो, फिर लाईन में खड़ा होता हूँ"। -" च..ल ...ल, तेरी... !... को, एक तू ही लाट साहब है? लाईन में खड़ा हो जा जल्दी... वरना दिन भर दौड़ाता रहूँगा , और एक बूंद पानी पीने नहीं दूंगा"
कमांडर की गालियाँ , अपमान, अत्यधिक प्यास और मानसिक चिंता से परेशान बिजय को ऐसा लगा जैसे उसके माथे के अन्दर कोई ज्वालामुखी फट रहा है। वह गुस्से से पागल सा हुआ जा रहा था और इसी गुस्से में उसने कुछ ऐसा निर्णय कर डाला जो उसे शायद नहीं करना चाहिए था...
वह सिर्फ इतना ही कहा- "आप बढ़ो, मैं आ रहा हूँ" कमांडर, बुदबुदाते हुए आगे बढ़ गया।
बिजय के दिमाग में एक ही बात घूम रहा था- बदला, इस अपमान और जिल्लत का बदला, वह अपने रायफल को उठाते हुए सोच रहा था, अभी इसमें गोलियां तो है नहीं पर इसका उपयोग लाठी जैसा तो किया ही जा सकता है, इसलिए इससे यदि इस दानव को एक ही वार में नहीं गिरा सका, तो यह मुझे निश्चित मार डालेगा, इसलिए उसने अपने रायफल के बट को सामने की ओर करते हुए नली को अपने दोनों हांथों से मजबूती से पकड़ा और शरीर की सारी शक्तियों को हांथों में इकठ्ठा करते हुए रायफल के बट से उस दानव नुमा कमांडर के गर्दन पर दे मारा...
कमांडर हल्का सा लहराया और एक विशाल पेड़ के जैसा जमीन पर गीर पड़ा।
कुछ मिनटों में ही सभी जवान दौर कर उस जगह इकठ्ठा हो गए। बिजय रायफल को हांथों में लेकर उसी जगह चुपचाप खड़ा रहा, शुन्य में देखता हुआ, जैसे कुछ हुआ ही नहीं था, वह भागने का या किसी भी तरह का विरोध नहीं कर रहा था। आधे घंटे के अन्दर सेना के बड़े अफसर आ गए। बिजय के दोनों तरफ दो संत्री बन्दुक लेकर खड़े हो गए और उससे कहा गया-" बेल्ट खोलो" बिजय बेल्ट खोला... अब वह गिरफ्तार हो चूका था। उसे जेल में डाल दिया गया।
कमांडर को तब तक अस्पताल ले जाया गया था।
सेना के अदालत में जीस समय यह मामला चल रहा था उस समय तक कमांडर स्वस्थ हो चूका था। सभी जवान जान रहे थे की बिजय का कोर्टमार्शल होना निश्चित है। सेना के अदालत में इस पूरी घटना पर वादी और प्रतिवादी वकीलों में वहस चल रहा था। कमांडर से पूरी घटना की जानकारी ली गयी, वह सख्त मिजाज का तो था लेकिन एक सच्चा इंसान भी था, इसलिए उसने घटना को पूरी सच्चाई के साथ अदालत में कहा... की कैसे उसने एक अत्यंत प्यासे को पानी पीने नहीं दिया था और उसके साथ कैसे पेश आया था। इसी सच्चाई को आधार बनाकर बिजय का वकील इस तरह दलील दिया... "माननीय न्यायाधीश महोदय, मैं आपको यदि इसी गर्मी के दिनों में सुबह छे बजे से दोपहर बारह बजे तक इतनी ही वजन के साथ मैदान में मार्च करने को कहूँ और आपको पानी पीने न दूँ तो आप ऐसी स्तिथि में मुझ पर क्या कारर्वाई करते हैं ये देखने के बाद ही इस मामले का फैसला हो सकता है, अन्यथा नहीं।
न्यायाधीश महोदय ने निर्णय को दुसरे दिन के लिए मुल्तबी रखा।
दुसरे दिन अदालत ने निर्णय सुनाया- "स्तिथि की गंभीरता को महसूस करते हुए और कमांडर द्वारा घटना के वर्णन की सच्चाई के मद्देनजर, यह निर्णय लिया जाता है की बिजय सिंह मार्च के बाद अत्यंत थका हुआ था और उसकी शारीरिक एबं मानसिक स्तिथि भी ठीक नहीं था, वह जो कुछ किया उसे सामायिक पागलपन ही कहा जा सकता है, ऐसी स्तिथि में कोई भी ऐसा कर सकता है। इसलिए बिजय सिंह को इस चार्ज से मुक्त किया जाता है पर सेना में अनुशाशन को बरक़रार रखने के लिए उच्च अधिकारी पर वार करने के जुर्म में उसे एक सप्ताह तक प्रतिदिन दस कम्बलों के साथ दो घंटे मार्च करते रहना होगा और इस दौरान वह जेल में ही रहेगा। सजा पूरी होने के बाद उसे अपनी घर की स्तिथि देखने के लिए एक माह का छुट्टी दिया जायेगा।
अदालत के इस निर्णय से उसके सभी साथी और कमांडर भी बेहद खुश हो गए। उस दिन के बाद से कमांडर के स्वभाव में भी काफी परिवर्तन हो गया था।



Wednesday, November 3, 2010

आदमी या धर्म ?

सभी धर्म हमें आदमी यानि मनुष्य बनना सिखाता है। पर आदमी कभी धार्मिक नहीं हो पाया। धर्म के नाम पर हमने सिखा केवल ढोंग और अन्धाबिश्वाश। जिसके पीछे कोई सर्वमान्य तर्क हमे अब तक नहीं मिला।
धर्म के नाम पर हम खुद ही अपने आप को बांटकर,एक दुसरे को श्रेष्ठ कहलाने के लिए ,आपस ही में लड़ते हुए, एक दुसरे की अबिराम हत्या करते हुए अपने वजूद को ही ख़त्म कर रहे है ? ऐसा क्यों?
क्यों धर्म के नाम पर अन्धाबिश्वाश को एक ऐसा हथियार बनाया जिससे किसी भी असहाय, गरीब, मुर्ख मनुष्य समुदाय को शक्तिशाली, धनि मनुष्य समुदाय जब चाहे अपने हित साधने के लिए उस अन्धविश्वाश का उपयोग कर सके।
हमारे राज्य की राजधानी से केवल ३० - ४० की० मि० दूर आज भी किसी असहाय गरीब परिवार की थोड़ी सी जमीं को अपने कब्जे में करने के लिए उस परिवार के किसी को भी डायन बता कर पुरे परिवार की आहुति ली जाती है.

Tuesday, November 2, 2010

चलते चलते

कार्यालय की छुट्टी हुई थी। हम सभी घर की ओर लौट रहे थे। पास के दुसरे कार्यालय की गाड़िया तेज गति से जा रही थी। एक चिनिया बादाम वाला अपने खोमचे को शर पर रख कर सड़क के किनारे से अपने घर की ओर लौट रहा था। अचानक एक तेज गति से आनेवाली गाड़ी उस खोमचेवाले को टक्कर मार कर निकल गया। खोमचेवाले का सारा बादाम सड़क पर तितर-बितर हो चूका था। बादामों को पिसते हुए गाड़ियाँ दौर रही थी. उसे भी चोट लगी थी। वह दर्द से छटपटाते हुए अपने कमर पर हाथ रखकर तेज गति से आनेवाली गाड़ियों को रोकने की कोशिश करते हुए चिल्ला रहा था " ए भैया, ए बाबु, ए मालिक जरा सा रुक जा भैया, हाय रे हमार बादाम, अब हम का बेचब , बचोवन का रोटी कहा से लाब" तब तक सारे बादाम नष्ट हो चुके थे और उसका खोमचा जो साधारण लकड़ी के बने थे वह भी टूट चूका था। उसकी सारी पूंजी नष्ट हो गयी थी। लेकिन फिर भी कोई गाड़ी वाला नहीं रुका।
ये अलग बात है की हम कुछ लोग आपस में चंदा करके थोड़ी सी रुपये जमा करके उस के हाथ में दिए ये सोच कर की शायद इससे उसकी कुछ मदद हो जाये?
क्या हमारी संबेदना में कमी आ गयी है?