Sunday, September 26, 2010

सुख-dukh

मेरे पिताजी कहते थे की आदमी जो भी सुख और आनंद का उपभोग करता है वे सभी ईश्वर द्वारा रचे हुए है और आदमी जो भी दुःख और परेशानियों को भोगता है वे सभी उसके खुद के बनाये हुए है। यानी आदमी के अंदर जो कुछ अच्छा है वही ईश्वर है और इसीलिए इन अच्छी चींजों के बदौलत वह सुख और खुशियों को पाता है। उसकी श्रेष्टता और धन की शक्ति उसे अहंकारी बनाता है जो उसे जागतिक बस्तुयों का सुख तो देता है लेकिन अध्यात्मिक सुख उसे कभी नहीं मिल पाता। वह केवल धन और बिभिन्न उपभोक्ता सामग्रियों को पाने के लिए दौड़ता रहता है। उसे कभी चैन नहीं मिल पाता। उसका श्रेष्टता का अहंकार उसके जीवन में दुःख और परेशानियों को भर देता है।

आदमी bano

हजारों साल बीत गए पर आदमी अब तक आदमी नहीं बन पायाजाति, धर्म और संप्रदाय में ही बंट कर रह गया। खुद को औरों से अलग और बिशिष्ट दिखने के लिये आदमी खुद को ऊँची और नीची जाति में बाँट लियाजबकि हर कोई जानता है की उसके पास जैसे दो हाथ दो पैर दो आँखे है वैसे ही औरों के पास भी हैंये सच है की किसीके पास प्राकृतिक रूप से बुद्धि ज्यादा होने के कारन वह अपनी बुद्धि और कौशल से औरो से अधिक धन और शिक्षा प्राप्त कर लेता है फिर प्रारंभ होता है उस बुद्धि और कौशल का दुरुपयोगआदमी उसी बुद्धि और कौशल से अधिक से अधिक धन और शक्ति कमाता हैफिर उसीसे औरों को यह मानने पर बाध्य करता है के वह श्रेष्ट है तथादुसरे निकृष्टश्रेष्टता के निदर्शन के लिये वह अपने आप को धर्म, जाति और सम्प्रदाय में बांटता जाता हैइसी श्रेष्टता को प्रमाणित करने के लिये वह औरों का शोषण करता है और तकत्बर बनता जाता हैयही ताकत उसे अहंकारी बनाता हैअहंकार उसे शोषक और आत्याचारी बनाता है
एक प्रश्न अक्सर मेरे मन में आता है- प्रागैतिहासिक काल में जब आदमी जंगलों और गुफयों में रहता था और रात के अँधेरे में जंगल के दुसरे जानवरों से डरते हुए रात गुजारा करता था, बरसात में बिजली के करक में थर थर कांप रहा था उस समय वह किस भगवन को याद करता था ? उस समय कहाँ थे भगवान्, अल्लाह, जेसस और तथाकथित सर्वशक्तिमान ईश्वर ? सुबह जब सूर्योदय हुआ तो खुद व खुद उसका डर का अंत हो गया। स्वाभाविक है के वह सबसे पहले सूर्य का आराधना ही किया होगा क्योंकि उस शक्तिपुंज के कारन उसे हिम्मत मिला। जहाँ से उसे पेट की भूख मिटाने के लिये भोजन प्राप्त हुआ या जिस पर वह अपनी शारीरिक शक्ति से विही प्राप्त नहीं कर पा सकता हो , उसे ही वह ईश्वर , भगवान्, जेसस आदि मानने लगा होगा। जैसे नदियाँ, पेड़-पौधें, पहाड़ -पर्वत,
रामकृष्ण परमहंश द्वारा कहा गया एक बाक्य याद आ रह है- " सबार उपरे मानुष सत्य ताहार उपरे नाई ." अगर आदमी ही नहीं होता तो ईश्वर , अल्लाह, जेसस को कौन जानता ? आदमी की कल्पना ही तो ईश्वर, अल्लाह और जेसस को बनाया। है न ?