Sunday, September 11, 2011

चर्चा ज्वलंत मुद्दों पर

इन दिनों 'भ्रष्टाचार' और उसके सहोदर 'राईट टु रिकॉल और राईट टु रिजेक्ट' मुद्दों पर देश भर में आम आदमी से लेकर तथाकथित ख़ास व्यक्तित्यों में चर्चाएँ छिड़ी हुई हैं। ऐसा लगता ही नहीं वल्कि विश्वाश होने लगा है की देश के सभी लोग उपरोक्त मुद्दों पर कानून बनाने के लिए संसद को वाध्य करके ही दम लेंगे। मेरे मन में सवाल ये आ रहा है की 'भ्रष्टाचार' की परिभाषा क्या है ? यदि इस शब्द को परिभाषित किया जाये तो .....

" बंगला भाषा में एक कहावत है 'ठग बाछते गावं उजाड़' यानि जब आप गावं में ठग चुनने निकलेंगे तो शायद ये पाया जय की गवां के सभी लोग ठग हैं।

'भ्रष्टाचार की पारिभाषिक अर्थ के अनुसार 'सौ में निन्यानाब्बे बेईमान फिर भी भारत महान'। आज जिन्हें हम भ्रष्टाचारी कह रहे हैं, उन्हें हमने ही चुन कर संसद में भेजा था। ये अलग बात है की उन्हें चुनने के पीछे हमारी मंशा कुछ और थी और उनकी मंशा कुछ और....

कल एक अति वृद्ध शिक्षक महोदय से बातें हो रही थी, उनका कहना था की 'ये घूसखोरी या भ्रष्टाचार कोई नयी तो है नहीं, मैं १९५२ में जब एक मिडिल स्कूल का हेडमास्टर था उस समय भी हम शिक्षकों को समय पर वेतन पाने के लिए प्रति माह २५ रुपये देने पड़ते थे।

चलिए फिर से आते हैं उसी विषय पर की यह कानून लागू करेगा कौन ? जाहिर सी बात है, की यह कानून जिनके या जिन लोगों पर लागू होने की संभावना अधिक है, वे ही इस कानून को बनायेंगे भी, फलस्वरूप वे पुरजोर कोशिश करेंगे की यह कानून लागू नहीं हो या हो भी तो इसमें इतनी पेंच हो की उन पर कोई आंच नहीं आ पाए।