Saturday, January 15, 2011

महंगाई के कारण

महान देश के,
महान राजनेता,
महिमामयी वाक्यों से,
देश के विकास की,
गौरव गाथा का बयान कर रहे थे॥
गरीबी रेखा से नीचे की,
जनताओं की
क्रय शक्ति बढ़ने के कारण
महंगायी बढ़ी है, ऐसा ही बता रहे थे...
फिर भी मिडिया वाले,
पता नहीं कहाँ-कहाँ से,
भूख से मरनेवालों की खबरें,
तस्बीरों के साथ,
छाप रहे थे...
यह बिपक्ष का चाल है,
यह भी बता रहे थे...

Sunday, January 9, 2011

यह सच है

बचपन से जवानी तक एक साथ खेल कर हम सब बड़े हुए थे। बंगाली, पंजाबी, बिहारी (यानि जिनकी मातृभाषा हिंदी है ), मुस्लमान, क्रिस्चन, ब्रह्मण, चमार, कायस्थ , नामधारी और शिख गरीब और अमीर मेरा ये शहर एक छोटा सा क़स्बा नुमा शहर था जो एक छोटी सी पहाड़ी नदी के किनारे बसा हुआ है।
जंहाँ तक याद है...
ऐसा कभी महसूस ही नहीं हुआ की हम में से कोई एक दुसरे से अलग है। एक साथ खेलते-कूदते कभी भी किसी ने एक दुसरे पर उसके धर्म, भाषा, जाती या अमीरी को लेन का साहस नहीं किया। क्योंकि वह जनता था की इनमे से किसी का भी भाषा में उपयोग करने पर उसे उसी समय सर्वसम्मति से बहिस्कृत कर दिया जायेगा।
एक ही साथ हमलोग हर धर्मं के मौज,ख़ुशी, धूम धडाका वाली पर्वों को मनाया करते थे...
दुर्गापूजा, दिवाली, होली, के साथ-साथ ईद, बकरीद, क्रिस्मास, और गुरुपर्व। हर जगह हम, सभी एक साथ दीख जाते थे।
घुटू,बुबुन, पप्पू, तबरेज, जोगिन्दर, झुनुवा जैसे ही और कितने-कितने। अब सबका नाम लिखने लगूं तो सारी रात भी कम पड़ेगी।
प्रयात प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी के असमय, क्रूर हत्या के बाद देश में जो कुछ हुआ था उसकी पुनराब्रित्ति करने से कोई फायदा तो नहीं लेकिन उन्ही के शासन काल में देश में आपातकाल जारी हुआ था। मैं आपातकाल की अच्छाइयों या बुराइयों के सम्बन्ध में चर्चा नहीं करने जा रहा हूँ। लेकिन उस समय सरकारी कार्यालयों की काम-काज की स्तिथि के बारे में बताना आबश्यक समझ रहा हूँ । हमारे जिले के कचहरी में स्थित जितने भी अलग-अलग विभागों के कार्यालय थे उनमे उस समय कर्मचारियों की हाजरी शत-प्रतिशत होती थी और सुबह नौ बजे आफिश आने की जगह आठ बजे ही लोग पहुँच जाते और पांच बजे लौटने की जगह सात बजे घर लौटते इसके बाद भी चिंतित रहते थे की कब कार्यालय से बुलावा आ जाये।
कितनी अनुशाषित हो गए थे हम, अधिकतर कार्यालय के घुसखोर कर्मचारियों को घुष लगभग नहीं के बराबर मिलते थे। हर काम स्मूथली चल रहा था।
एक वाकया और सुनाता हूँ...
दो साल पहले तक, मेरे शहर में बाईक चलने वाले कोई भी हेलमेट नहीं पहना करता था। मेरे एक मित्र हैं परिवहन विभाग के उच्च अधिकारी। उस समय एक दिन उनके घर पर हम कुछ मित्र बैठकर बातें कर रहे थे। शहर के परिवहन व्यवस्था पर बात चल पड़ी। मैंने कहा, की "सभी को हेलमेट पहनकर बाईक चलाना जरुरी कर देना चाहिए लेकिन यह नियम यहाँ नहीं चलने वाला..." मित्र के सम्मान में शायद चोट लगा " देखो, अगले पंद्रह दिनों में सबके माथे पर हेलमेट नहीं पहना दिया तो नौकरी छोड़ दूंगा"
दुसरे ही दिन से हर चौराहे पर बिना हेलमेट वालों पर परिवहन विभाग के नियमानुसार सौ रुपये दंड लगाया जाने लगा फलस्वरूप आज की तारीख तक सहर के लगभग नब्बे प्रतिशत बाईक चलनेवाले हेलमेट पहनकर ही बाईक चलते हैं।
ऊपर के दोनों वाकये से क्या प्रमाणित होता है?
डंडा...कानून के डंडा का अगर सही तरीके से उपयोग किया जाये तो अपने-आप सभी सही रस्ते पर आ जाते हैं।
ऐसा क्यों?
दो-चार माह पहले की बात है, हमारे अपार्टमेन्ट से साटें हुए एक और अपार्टमेन्ट बन रहा है। उसके बिल्डिंग मटेरियल रोड पर ही पड़े रहते थे। स्कूटर, साईकिल, रिक्शा के साथ-साथ पैदल चलना भी मुस्किल होने लगा था। मैंने बिल्डिंग के मुन्सी को बुलाकर कहा की " भैया, ये सब छार्री, बालू रोड से हटवाकर थोडा अन्दर करवा दीजिये, लोगों को आने जाने में असुबिधा हो रहा है" उसने वादा किया की शाम तक ये सब हटा देगा। अगले दो-तिन दिनों तक उसने अपने वादे पे अमल नहीं किया।
फिर तिन दिन बाद दुबारा गया और कहा " सुनो, बाबु, भैया कहकर प्यार से कहा था की ये सब हटवा लो, आने-जाने में दिक्कत होता है, तुम सुने नहीं, अब अगले दो घंटे में अगर इसे हटा नहीं लोगे तो तीसरे घंटे में मैं आयूंगा और तुम्हारा हाँथ-पावं तोड़ दूंगा। देखते हैं तुम्हारा मालिक क्या करता है"?
और आप बिश्वास करेंगे?
दो घंटा तो क्या डेढ़ घंटे में ही रोड खाली हो गया था।
ऐसा क्यों होता है की मीठे बोल सुनकर लोग आपको कमजोर, निरीह, भद्र , समझते हैं और आपका कोई काम सहज में ही नहीं करते और उसी बोल को करवे शब्द में बोलने पर आपका काम आसानी से हो जाता है।
ये मेरा व्यक्तिगत अनुभव है, औरों की तो कह नहीं सकता।
नौकरी के सिलसिले में मैं इस शहर को कई साल पहले छोड़कर चला आया था। कई साल बाद इस शहर के लिए एक दौरा कार्यक्रम बना

मैं शुरुवात में जो कह रहा था उससे भटक गया था। अब फिर मुद्दे पे आता हूँ...





जारी रहेगा ....

Thursday, January 6, 2011

संवेदना

"नमस्ते दीदी, कैसी हैं आप?"
"ठीक ही हूँ", - अचानक जोर से चिल्लाते हुए-" अरे बहु, क्या उह-आह लगा रखी है, जल्दी करो, कपडे धोकर बर्तन भी मांजने हैं, बहाना करने से नहीं चलेगा, एक तुम्ही बच्चा पैदा नहीं कर रही हो, हम भी किये हैं और सारे घर का काम करते हुए.... क्यों दीदी सच कह रहीं हूँ ?"
- बहु दर्द से छटपटाते हुए भी कपडे धोती रही
- अन्दर के कमरे से एक और आवाज रही है-" ऊह..माँ..." "एक मिनट दीदी अभी आती हूँ" "...हाँ बेटी बहुत दर्द हो रहा है?" अब एक शरीर से दूसरा शरीर निकलना...दर्द तो होगा ही..तुम सोयी रहो, लाओ मैं पांव दबा दूँ, कुछ खाओगी?...मंगा दूँ ?
" नहीं मुझे कुछ भी खाने का मन नहीं कर रहा है"
" ना बेटी, ऐसा कहने से कैसे चलेगा, तू खाएगी तभी तो बच्चा स्वस्थ होगा?
"मम्मी जी, बहुत भूख लगी है, कुछ खा लूँ ?, फिर बर्तन मांज लुंगी" बहु कह रही है।
"हाँ-हाँ, देख रसोई में रोटी रखी है, गुर के साथ खा ले, देखना, पनीर रखा है, उसे छूना मत, वो मेरी बेटी के लिए है"