वकौल एम्० जे० अकबर साहब.....
डॉ.बिनायक सेन जैसे लोगों को उम्रकैद की सजा सुना दी जाती है और डकैतों को wiलासितापूर्ण जीवन जीने की सुविधा दी जाती है। लुटेरों के चेहरों को लोगों के सामने लाने के लिए सरकार के ऊपर वर्षों तक दबाव बनाया जाता है। जब सरकार इन दवाबों को झेलती हुई कारर्वाई शुरू करती है, तब तक सभी सबूतों पर धुल जम जाती है। इस तरह देश की संपत्ति लुट रहे लुटेरे पाक साफ हो जाते हैं। ऐसे में इस बात की उम्मीद कोई बेवकूफ ही कर सकता है की उस घोटालों की जांच में आज कुछ भी निकल कर आये।
जब विनायक सेन को सजा मिलती है, तो यह सभी अख़बारों की सुर्खी बन जाती है, लेकिन जब सेन पर ट्रायल चल रहा था तब मीडिया कहाँ थी?
विनायक सेन जैसे लोगों की आवाज देशद्रोह और संसद के भीतर कुंडली मार कर बैठे सत्ता के दलाल की कारस्तानियाँ देश का सिर गर्व से ऊँचा उठानेवाली है?
आज अंतर यह है की जो लोग कमजोर की आवाज हैं, वे देशद्रोही हैं, और जो लोग उन्ही कमजोरों के पैसों पर मलाई खा रहे है, वे देश चलनेवाले है। अगर इनको जेलों में भरा जाने लगा, तो देश के जेलों में जगह नहीं बचेगी, इस बात से इनकार किया जा सकता है क्या?
आतंकवादी और नक्सलवादी तो पहचान लिए जा रहे है, लेकिन उनको कौन पहचानेगा, जो सत्ता में छिपे आतंकवादी हैं ?
warshon beet gaye aadmi 'aadmi' nahi ban paya. janwar bhi aisi harkat nahi karte jaisa ki aadmi kar lete hai. aasam ki ghatna udaharan matra hai.
Monday, December 27, 2010
Wednesday, December 22, 2010
वेचारा भकुआ
- जरुरत से ज्यादा सीधा सादा कोई व्यक्ति, जो जाने-अनजाने, मनुष्य तो क्या किसी जानवर या पेड़ पौधे का भी अहित करने के सम्बन्ध में सोंच भी नहीं सकता हो, हमेशा हर किसी को मदद करने के लिए तैयार रहे, और खुद पर होते हुए सभी तरह के अन्याय को चुपचाप सहन करता रहे को हमारे समाज में वेचारा ही कहा जाता है।
- इसके विपरीत जो व्यक्ति अपने चालाकी और कैयांपन से औरों को मुर्ख बनाकर अपने सभी काम करवा लेता हो को बुध्धिमान, होशियार कहा जाता है।
- नानावती गावं के रामदीन और दीनदयाल ऐसे ही दो विपरीत स्वभाव वाले सगे भाई थे।
- दीनदयाल उर्फ़ दीनु गावं के सभी का बिन वेतन का नौकर था। चाहे तीन कोष दूर बाजार से कोई सामान लाना हो या दवाएं, मवेशियों का चारा लाना हो या जंगल में चरने गए गाय-बकरियों को लौटकर सबके घर-घर तक पहुचाना हो- सभी कामों के लिए दीनू हाजिर रहता। इन कामों के साथ-साथ वह गावं के आस-पास के पेड़-पौधों, चिड़ियों का देखभाल भी करता रहता। उनसे बातें भी करता रहता था।
- कोईं माने या न माने, मनुष्य भले ही पेड़-पौधों, जानवरों और पक्षियों की भाषा नहीं समझता हो, लेकिन ये सभी किसी विशेष मनुष्य की प्यार और संवेदना की भाषा अच्छी तरह समझ सकता है।
- इसलिए दीनू की मानवता की भाषा वे सभी समझते थे। पर गावं के लोग उसे 'भकुवा' कह कर ही पुकारते थे। जवान होते-होते दीनू अपना असली नाम भी भूलने लगा था। कोई अनजान व्यक्ति उसे उसका नाम पूछने पर वह अपना नाम 'भकुवा' ही कहता था। क्योंकि अब वह इसी नाम का अभ्यस्त जो हो गया था।
- रामदीन विवाहित था। उसके चार बच्चे थे। तीन बेटियां और एक बेटा। खेती-बारी का सारा काम दोनों भाई मिल कर ही करते थे। फसलों को बेच कर जो धन आता था उसे वह अपने नाम से बैंक में रखता था। भैया-भाभी का दीनू इतनी अधिक इज्जत करता था की इस सम्बन्ध में उसने कभी भी भैया या भाभी से कोई सवाल-जवाब नहीं करता था। उन दोनों के पिता स्वर्गवासी हो चुके थे। माँ अभी जीवित थी।
- घर के सभी कामों को करते हुए ही वह खेती-बारी के काम में अपने भैया को सहायता करता रहता था। अपने भतीजा-भतीजी के साथ-साथ वह गावं के सभी बच्चों का प्यारा चाचा था। न जाने कितने बच्चे उसके गोद में खेलते हुए बड़े हो गए थे।
- इन्ही में से एक थी बैजनाथ जी के चार वर्ष की बेटी यमुना। दीनू का लगाव सबसे अधिक उसी से था, क्योंकि वह जन्म से ही अंधी थी। बैजनाथ जी का घर दीनू के घर के पास ही था। रोज सुबह और शाम दीनू उसे गावं के पास ही बहती हुई नदी के किनारे सैर करवाने ले जाता था। रामदीन और दीनू का कोई बहन नहीं था, वैसे बहन नहीं रहने के कारन रामदीन को तो कोई फर्क नहीं पड़ता था, लेकिन भाई दूज और राखी के पर्वों पर दीनू जरुर उदास रहता था। दीनू की बहन की कमी यमुना ने ही पूरा कर दिया था। पांच वर्ष की उम्र से ही यमुना दीनू भैया के हांथों में राखी बंधती और भाई दूज में उसे टिका लगाती आ रही थी। इन दोनों भाई-बहनों का प्यार पुरे गावं में आदर्श के रूप में देखा जाता था।
- रामदीन की पत्नी भागमंती जब इस घर में बहु होकर आई थी, उस समय दीनू दस-बारह साल का रहा होगा। वह गावं के पाठशाला में चौथी में पढ़ रहा था। नई भौजी की प्रेम भरी बातें कुछ ही दिनों में उसे सम्मोहित कर दिया था। उनकी सेवा और आदेशों का पालन करते हुए कब उसकी पढाई छुट गया, और कब वह भैया-भाभी का जर खरीद गुलाम बन कर रह गया, उसे खुद भी याद नहीं ।
- घर पर उसकी और उसके माँ की स्तिथि लगभग एक जैसा ही था। सरकार के 'काम के बदले अनाज' कार्यक्रम जैसा ही उन दोनों को भी काम के बदले चार वक़्त का भोजन मिल जाया करता था, पर घर के किसी भी मामले में बात करने का अधिकार उन्हें नहीं था। उन्हें तो क्या, घर के तथाकथित मालिक रामदीन को भी नहीं। सारे निर्णय और आदेश भागमंती के ही होते थे।
- इन दिनों माँ जी को दीनू के भबिष्य की चिंता सता रही थी। आगामी दिनों में बहु का वर्ताव दीनू के प्रति कैसा रहेगा इसका अंदाजा वह कर पा रहीं थी। इसलिए जीवित रहते ही वे दीनू का घर बसाना चाहती थीं। लेकिन इसके लिए भागमंती का अनुमति जरुरी था।
- दस-ग्यारह वर्षों में ही चार बच्चों की माँ बनकर भागमंती काफी कमजोर हो गयी थी, इन दिनों वह अक्सर बीमार रहती थी,
चार बच्चों की माँ, भागमंती विवाह के बाद महीना- छः महीना तो सुशील और आँगाकारी ही थी, पर जैसे-जैसे दिन बीतते गए, बेटियां बड़ी होती गयी, वह भबिष्य की चिंता में उसे सँवारने में लग गयी।
- दीनू को पूरी तरह जायदाद से बेदखल करके रामदीन को वह मालिक बनाना चाहती थी। लेकिन गावं के लोगों के आँखों में भी धूल झोंकना था, इसलिए एक योजना के तहत आगे बढ़ना था।
- कई दिनों से सासु माँ भागमंती से दीनू की शादी के सम्बन्ध में बात करना चाहती थी, लेकिन बहु केवल दोनों शाम उनके पास खाना परोसने के समय ही आती थी, और उस समय उसके चेहरे पर जो भाव होते थे.... माँ जी को उससे बातें करने की हिम्मत नहीं होती थी। फिर भी एक दिन उन्होंने साहस जुटाकर बहु से कहा- " बहु, कुछ देर मेरे पास बैठ तो लो, कितनी थकी हुई दीख रही हो"
- भागमंती को सास की बातें सुन कर आश्चर्य तो हुआ, फिर भी वह जानती और मन ही मन मानती भी थी की गावं के दुसरे सासों की तुलना में उसकी सास उसे बेटी जैसा ही प्यार दिया था, क्योंकि उनकी कोई बेटी नहीं थी। कुछ देर के लिए उसके मन में सास के प्रति ममता जाग उठी-" हाँ, माँ जी, मन तो करता है की आप के पास कुछ देर बैठकर बातें करूँ, लेकिन गृहस्थी के कामों से इतनी थक जाती हूँ की चाहकर भी आ नहीं पाती"
दीनू तो अब जवान हो गया है, दिन भर इधर-उधर घूमता रहता है, वैसे बेटी तुम तो उसका ख्याल रखते ही हो, लेकिन कब तक तुम उसका देख-भाल करती रहोगी? देख रही हूँ ,की इन दिनों तुम्हारा स्वास्थ भी ठीक नहीं रहता, कितनी गोरी और भरा-भरा शारीर था तुम्हारा ! इसलिए मैं कह रही थी की
- इसके विपरीत जो व्यक्ति अपने चालाकी और कैयांपन से औरों को मुर्ख बनाकर अपने सभी काम करवा लेता हो को बुध्धिमान, होशियार कहा जाता है।
- नानावती गावं के रामदीन और दीनदयाल ऐसे ही दो विपरीत स्वभाव वाले सगे भाई थे।
- दीनदयाल उर्फ़ दीनु गावं के सभी का बिन वेतन का नौकर था। चाहे तीन कोष दूर बाजार से कोई सामान लाना हो या दवाएं, मवेशियों का चारा लाना हो या जंगल में चरने गए गाय-बकरियों को लौटकर सबके घर-घर तक पहुचाना हो- सभी कामों के लिए दीनू हाजिर रहता। इन कामों के साथ-साथ वह गावं के आस-पास के पेड़-पौधों, चिड़ियों का देखभाल भी करता रहता। उनसे बातें भी करता रहता था।
- कोईं माने या न माने, मनुष्य भले ही पेड़-पौधों, जानवरों और पक्षियों की भाषा नहीं समझता हो, लेकिन ये सभी किसी विशेष मनुष्य की प्यार और संवेदना की भाषा अच्छी तरह समझ सकता है।
- इसलिए दीनू की मानवता की भाषा वे सभी समझते थे। पर गावं के लोग उसे 'भकुवा' कह कर ही पुकारते थे। जवान होते-होते दीनू अपना असली नाम भी भूलने लगा था। कोई अनजान व्यक्ति उसे उसका नाम पूछने पर वह अपना नाम 'भकुवा' ही कहता था। क्योंकि अब वह इसी नाम का अभ्यस्त जो हो गया था।
- रामदीन विवाहित था। उसके चार बच्चे थे। तीन बेटियां और एक बेटा। खेती-बारी का सारा काम दोनों भाई मिल कर ही करते थे। फसलों को बेच कर जो धन आता था उसे वह अपने नाम से बैंक में रखता था। भैया-भाभी का दीनू इतनी अधिक इज्जत करता था की इस सम्बन्ध में उसने कभी भी भैया या भाभी से कोई सवाल-जवाब नहीं करता था। उन दोनों के पिता स्वर्गवासी हो चुके थे। माँ अभी जीवित थी।
- घर के सभी कामों को करते हुए ही वह खेती-बारी के काम में अपने भैया को सहायता करता रहता था। अपने भतीजा-भतीजी के साथ-साथ वह गावं के सभी बच्चों का प्यारा चाचा था। न जाने कितने बच्चे उसके गोद में खेलते हुए बड़े हो गए थे।
- इन्ही में से एक थी बैजनाथ जी के चार वर्ष की बेटी यमुना। दीनू का लगाव सबसे अधिक उसी से था, क्योंकि वह जन्म से ही अंधी थी। बैजनाथ जी का घर दीनू के घर के पास ही था। रोज सुबह और शाम दीनू उसे गावं के पास ही बहती हुई नदी के किनारे सैर करवाने ले जाता था। रामदीन और दीनू का कोई बहन नहीं था, वैसे बहन नहीं रहने के कारन रामदीन को तो कोई फर्क नहीं पड़ता था, लेकिन भाई दूज और राखी के पर्वों पर दीनू जरुर उदास रहता था। दीनू की बहन की कमी यमुना ने ही पूरा कर दिया था। पांच वर्ष की उम्र से ही यमुना दीनू भैया के हांथों में राखी बंधती और भाई दूज में उसे टिका लगाती आ रही थी। इन दोनों भाई-बहनों का प्यार पुरे गावं में आदर्श के रूप में देखा जाता था।
- रामदीन की पत्नी भागमंती जब इस घर में बहु होकर आई थी, उस समय दीनू दस-बारह साल का रहा होगा। वह गावं के पाठशाला में चौथी में पढ़ रहा था। नई भौजी की प्रेम भरी बातें कुछ ही दिनों में उसे सम्मोहित कर दिया था। उनकी सेवा और आदेशों का पालन करते हुए कब उसकी पढाई छुट गया, और कब वह भैया-भाभी का जर खरीद गुलाम बन कर रह गया, उसे खुद भी याद नहीं ।
- घर पर उसकी और उसके माँ की स्तिथि लगभग एक जैसा ही था। सरकार के 'काम के बदले अनाज' कार्यक्रम जैसा ही उन दोनों को भी काम के बदले चार वक़्त का भोजन मिल जाया करता था, पर घर के किसी भी मामले में बात करने का अधिकार उन्हें नहीं था। उन्हें तो क्या, घर के तथाकथित मालिक रामदीन को भी नहीं। सारे निर्णय और आदेश भागमंती के ही होते थे।
- इन दिनों माँ जी को दीनू के भबिष्य की चिंता सता रही थी। आगामी दिनों में बहु का वर्ताव दीनू के प्रति कैसा रहेगा इसका अंदाजा वह कर पा रहीं थी। इसलिए जीवित रहते ही वे दीनू का घर बसाना चाहती थीं। लेकिन इसके लिए भागमंती का अनुमति जरुरी था।
- दस-ग्यारह वर्षों में ही चार बच्चों की माँ बनकर भागमंती काफी कमजोर हो गयी थी, इन दिनों वह अक्सर बीमार रहती थी,
चार बच्चों की माँ, भागमंती विवाह के बाद महीना- छः महीना तो सुशील और आँगाकारी ही थी, पर जैसे-जैसे दिन बीतते गए, बेटियां बड़ी होती गयी, वह भबिष्य की चिंता में उसे सँवारने में लग गयी।
- दीनू को पूरी तरह जायदाद से बेदखल करके रामदीन को वह मालिक बनाना चाहती थी। लेकिन गावं के लोगों के आँखों में भी धूल झोंकना था, इसलिए एक योजना के तहत आगे बढ़ना था।
- कई दिनों से सासु माँ भागमंती से दीनू की शादी के सम्बन्ध में बात करना चाहती थी, लेकिन बहु केवल दोनों शाम उनके पास खाना परोसने के समय ही आती थी, और उस समय उसके चेहरे पर जो भाव होते थे.... माँ जी को उससे बातें करने की हिम्मत नहीं होती थी। फिर भी एक दिन उन्होंने साहस जुटाकर बहु से कहा- " बहु, कुछ देर मेरे पास बैठ तो लो, कितनी थकी हुई दीख रही हो"
- भागमंती को सास की बातें सुन कर आश्चर्य तो हुआ, फिर भी वह जानती और मन ही मन मानती भी थी की गावं के दुसरे सासों की तुलना में उसकी सास उसे बेटी जैसा ही प्यार दिया था, क्योंकि उनकी कोई बेटी नहीं थी। कुछ देर के लिए उसके मन में सास के प्रति ममता जाग उठी-" हाँ, माँ जी, मन तो करता है की आप के पास कुछ देर बैठकर बातें करूँ, लेकिन गृहस्थी के कामों से इतनी थक जाती हूँ की चाहकर भी आ नहीं पाती"
दीनू तो अब जवान हो गया है, दिन भर इधर-उधर घूमता रहता है, वैसे बेटी तुम तो उसका ख्याल रखते ही हो, लेकिन कब तक तुम उसका देख-भाल करती रहोगी? देख रही हूँ ,की इन दिनों तुम्हारा स्वास्थ भी ठीक नहीं रहता, कितनी गोरी और भरा-भरा शारीर था तुम्हारा ! इसलिए मैं कह रही थी की
आज इतना ही। आगे फिर कभी। शुभ रात्री।
Sunday, December 19, 2010
"बुधी"
- चार-पांच साल पहले कुछ बकाये रुपयों के बदले किसी ने गाय की एक बछिया पिताजी को देकर गया था। इसकी देखभाल की जिम्मेवारी मुझ पर दी गयी थी। बछिया, बुधवार के दिन हमारे घर पर आई थी, इसलिए उसका नामकरण किया गया 'बुधी'। कुछ ही दिनों में यह बछिया घर के सभी सदस्यों के साथ घुल-मिल गयी थी। उसे कभी खूंटे से बांध कर नहीं रखा जाता था। सुबह जब हम भाई-बहने माँ के पास नास्ते के लिए आकर बैठते- तब बुधी भी माँ के सामने आकर खड़ी हो जाया करती थी। हमलोगों के जैसा ही उसे भी दो रोटियों में गुड का एक टुकड़ा मोड़कर दिया जाता- तभी वह मैदानों में घास चरने के लिए निकलती थी।
- बुधी को बेल खाना बेहद पसंद था... कभी-कभी वह घास चरति हुई दूर निकल जाती थी। शाम तक घर नहीं लौटने पर, उसे लाने के लिए मुझे भेज दिया जाता था। मुझे पता रहता था की वह किस तरफ गयी होगी।
- उसे ले आने से पहले मैं पास के पेड़ से एक बेल तोड़ लिया करता और दोनों हथेलियों को मुहं के पास घेरा बनाकर एक विशेष दिशा की ऑर करके, जोर से उसका नाम लेकर चिल्लाता... "बू...ध...ई...ई..." दूर कहीं से उसकी आवाज सुनाई पड़ती...." ह...म...म..आ...आ...आ.." बुधी पूंछ खड़ी करके अपनी सर को हिलाती हुई दौड़ती आती दिखाई पड़ती। मैं उसे बेल दिखाते हुए दौड़ पड़ता घर की ऑर... घर पर आकर भी, उसे तंग करने के लिए कुछ देर तक बेल को उसके मुहं के पास ले जाकर ऊपर-नीचे करता रहता.... आखिर तंग आकर वह अपने छोटे-छोटे सींगो वाली माथा से मुझे दीवाल पर दबाकर खड़ी हो जाती... मुझे चिल्लाते हुए सुनकर, माँ आँगन में निकल आती और मुझे डांटते हुए बेल लेकर उसे दे देती थी। कई बार किसी शैतानी के कारण यदि माँ हम में से किसी को मारने लगती तो बुधी माँ पर भी खफा हो जाती और अपने माथे से उसे ठेल दिया करती... माँ हंसती हुई कहती... " तू तो बच्चों को बिगाड़ देगी, शैतानी करेगा तो मारूंगी नहीं ?" वह सर हिलाती रहती। जैसे कहा रही हो की "हाँ, इन्हें मत मारो ..." अक्सर ऐसा लगता था की वह हमारी सभी बातों को समझती है केवल शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाती।
- दोपहर के भोजन के समय भी वह हाजीर रहती थी, उसे भी मिटटी के एक छोटे वर्तन में दाल-भात और सब्जियां दी जाती थी। दशहरा के समय जब हमारे लिए नये कपडे लाये जाते थे तब उसके गले में भी बड़ी कंचों की मोतियों की माला और सींगों पर लाल रिबोन बांधा जाता था।
- पडोश के लोग मजाक में कहते... "ये तो भैया की एक और लड़की है"
- दूध सी सफ़ेद, बुधी के, सींगों के बीचों-बीच माथे पर मयूर पंख जैसा एक काला दाग था। बुधी सुध्ध देशी गाय थी। इसलिए उसके सिंग भी छोटे-छोटे थे। हर एक-दो दिन के अंतराल पर मैं या पिताजी उसे नदी पर नहाने ले जाया करते थे। नहाना उसे खूब पसंद था। घर के सभी का प्यार और जतन से उसका सौंदर्य दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा था। कभी-कभी वह पास के सब्जियों के खेत में भी घुस जाया करती। कई बार उसे लोग अथक प्रयास से पकड़कर कांजी हायूस में बंद कर दिया करते थे। शाम तक जब वह घर नहीं लौटती तब दुसरे ही दिन पिताजी कांजी हायूस पहुँच जाते और कुछ रुपये दंड देकर उसे छुड़ाकर ले आया करते।
- ऐसा ही एक बार उसे लाते समय, जब वह मोहल्ले में पहुँच गयी, तो पहचाने हुए रास्ते को देखकर घर आने के लिए दौड़ पड़ी.... पिताजी रस्सी के झटके को संभाल नहीं पाए और रास्ते के किनारे पड़े हुए एक टूटे कांच के बोतल पर गिर पड़े.... उनकी हथेली काफी गहराई तक कट गयी। पिताजी पास के ही एक दवा दुकान से हाँथ पर पत्तियां बंधवा कर लौटे। उन्होंने आकर देखा की बुधी अपने नांद में में से खा रही थी। दो-तिन दिन की भूखी बुधी का पेट अब तक भर चूका था। पिताजी को देखकर वह उनके पास आई और उनके चोट लगे हांथो को अपने जीभ से सहलाने लगी।
शायद पहली बार हम बच्चों ने पिताजी के आँखों में आंशु देखे थे....
- अगले ही वर्ष बुधी एक बच्ची की माँ बन गयी थी.... हम सभी उसके बछिया को देखकर खुश हो गए थे।
- दूध निकलने के लिए उसके पैरों को कभी बांधा नहीं जाता था। वैसे भी वह कुल्लम दो-तीन किलो से अधिक दूध नहीं देती थी। उसपर माँ और पिताजी भी, इस बात का ध्यान रखते थे, की उसके बच्चे के लिए दूध कम न पड जाये। ठण्ड के दिनों में एक पुराने कम्बल को उसके पीठ पर बांध दिया जाता था। उस समय अमीरों के घर पर ही बिजली के पंखों का चलन हुआ करता था। हमारे घर पर बिजली के पंकें नहीं थे। अन्यथा शायद पिताजी उसके रहने के जगह पर पंखा भी लगा देते।
- बुधी, इसी तरह आराम और अपनत्व भरी जीवन जी रही थी।
- विगत दो-तिन सालों से इस राज्य पर भगवान् ईन्द्रदेव की कृपा दृष्टि नहीं हुई थी। वर्षा पर निर्भर इस राज्य में पैदावार नहीं के बराबर हुई थी। सूखे की मार से जनता त्राहि-त्राहि कर रही थी। हमारे कसबे के बाजार से अनाज गायब हो गए थे। जितने भी मिल रहे थे उसके दाम आसमान छू रहे थे। उसे खरीदकर खाने की आर्थिक स्थिति अधिकतर लोगों में नहीं था। दूर-दूर तक, सूखे हुए खेतों में कई वर्षों तक पानी की कमी से दरारें पड़ चुके थे। नदी, तालाव और आस-पास के सभी कुवें पूरी तरह सुख चुके थे। बड़े-बड़े पेड़ो में अभी भी कुछ पत्तियां दीख जाता था। झाड़ियों के पत्ते सुख कर नीचे पड़े हुए थे। सूखे मैदान और खेतों में गाय, भैंशे, बकरियां और दुसरे जानवर भूख से व्याकुल होकर घूम रहे थे। शायद कहीं कुछ घास-पत्ती नजर आ जाये, और वे कई दिनों से खाली पेट में कुछ डाल सकें। कहीं भी दूर से हरी पत्तियां दिख जाता तो सभी उस पर टूट पड़ते। बड़े-बड़े सिंग वाले ही अक्सर इन पत्तियों को खाने में सफल हो पाते थे ।
- अनाज के साथ-साथ पानी के लिए भी हाहाकार मची हुई थी। नगरपालिका के नल पर एक निश्चित समय तक ही पानी की आपूर्ति की जा रही थी। मोहल्ले में एक ही नल था, जिस पर रात रहते ही लोग बाल्टियों और हांडियों के कतार लगा देते थे। दस आदमी के उपयोग लायक पानी को सौ लोगों में बांटा जाता था। किसी को भी पीने लायक पानी भी पूरा नहीं पड़ता। नल पर- लगभग रोज ही गाली -गलौज, और मार-पिट लगा ही रहता था।
यह क़स्बा नुमा शहर एक पहाड़ी नदी के किनारे बसा था। जिनके घर नदी के किनारे या आस-पास ही थे, वे सुखी नदी के बालू को खोद कर पानी निकालते और सावधानी से उस पानी को अपने हांडियों में साफ़ कपड़ों से छानकर इकठ्ठा कर लेते।
- दिन गुजर रहे थे और अगला दिन और भयावह बनता जा रहा था। लगभग रोज ही इस शांत कसबे में कई लूट और चोरी-डकैती की वारदातों की खबर आ रही थी।
- पिताजी को अपनी साधारण आय से घर चलाना दिनों-दिन कठिन होता जा रहा था। अक्सर हमें भूखे ही रहना पड़ रहा था। राशन के दुकान पर मिलने वाले चावल और गेहूं के लिए घंटों हम बच्चे पारा- पारी लाईन में खड़े रहते। अधिकतर दिन खाली हाँथ लौटना पड़ता। जब भी कहीं से खबर मिलता की अमुक जगह मुफ्त में गेहूं की दलिया, चावल या पौडर दूध मिल रहा है तो हम बच्चे छोटे-छोटे झोले लेकर पहुँच जाते। मुफ्त में पाए जाने वाले उन चावलों में इतनी दुर्गन्ध होती थी की निगलना असंभव लगता था लेकिन भूख..... निगलने तक ही ख़राब लगता... गले से निचे उतारते ही सब ठीक हो जाता था।
अपना ही ये हाल था तो बुधी के लिए चारा, भूषि कहाँ से आ पाता...? इनके दाम भी इतने अधिक हो गए थे की उसे खरीदकर खिलाना पिताजी के सामान्य रोजगार में संभव नहीं हो पा रहा था।
- अक्सर पिताजी या माँ भूख नहीं रहने का बहाना करके, अपने हिस्से के चावल-दाल बुधी के नांद में ड़ाल दिया करते थे।
- बड़े होने के बाद, समझ में आया था की क्यों उनको भूख नहीं लगती थी....
- फिर भी बुधी और उसकी बछिया दुबलाती जा रही थी। माँ-पिताजी के साथ-साथ हम बच्चों का स्वस्थ भी दिनों-दिन कमजोर पड़ता जा रहा था। बुधी के साथ-साथ हम बच्चों के दुबले और हड्डियाँ निकले हुए शारीर को देखकर माँ और पिताजी की रातों की नींद और दिन का चैन शेष होता जा रहा था।
- आखिर एक दिन वे आपस में सलाह करके बुधी को किसी ऐसे व्यक्ति के पास भेजना तय किये जहाँ उसे भर पेट भोजन मिल सके।
- कसबे से दो-तिन मिल दूर एक छोटा गावं था। वहां एक सज्जन के पास कई गाये -भैंसे थी । वे पिताजी के मित्रों में से ही थे, इसलिए वे बुधी को अपने पास रखने के लिए राजी हो गये।
एक-दो दिन बाद उनका एक आदमी आया बुधी को ले जाने के लिये। पिताजी को पता था की उनका आदमी किस दिन बुधी को ले जायेगा। इसलिए वे सुबह ही किसी को कुछ बताये बिना घर से निकल गये थे। उस अनजान आदमी को देखते ही, बुधी को जैसे इस घर से हमेशा के लिये जाने का पुर्बाभास हो गया था। वह आदमी बुधी को ले जाने के लिये उसका रस्सी पकड़कर खींचने का कोशिश करने लगा... पर बुधी अपने दुर्वल शारीर की सारी शक्तियों को इकठ्ठा करके, चारों पैरों को आँगन में जमाकर खड़ी हो गयी। वह आदमी जब उसे ले जाने में असफल रहा, तो एक छड़ी से पीट कर उसे ले जाने का प्रयास किया। हम सभी जोर-जोर से रो रहे थे और माँ से विनती कर रहे थे बुधी को नहीं ले जाने देने के लिये.... पर उनके मजबूरी को समझने लायक उम्र हमारी नहीं थी। माँ खुद भी रो रही थी... आखिर माँ ने ही तो उसे इतने सालों से पाल-पोसकर बड़ी किये थे। अचानक, उस आदमी द्वारा बुधी को पिटते देखकर मेरी अत्यंत शांत माँ की जोर से बोलते हुए सुना..." ऐ, ख़बरदार उसे मारा तो..." शायद पहली बार माँ को इतनी जोर से किसी को डांटते हुए सुना था। उनका आवाज सुनकर हम डर से खुद ही रोना बंद कर दिए थे...
- बुधी अपनी असहाय, दुर्वल, और निरीह बड़ी-बड़ी आँखों से, जो भूख और कमजोरी के कारन अब अन्दर की ऑर धंश गया था, को उठाकर माँ की ऑर देख रही थी... जैसे कह रही हो की, मुझे किस दोष के कारन अपने से अलग कर रही हो.....?
- फिर सबसे कष्टकर समय मेरे लिये आया। जब माँ का आदेश हुआ- "मुन्ना, तू ही बुधी को लेकर जा, गावं के पास जाकर रस्सी इसके हाँथ में दे देना और जल्दी लौट आना"
- मेरे लिये यह काम इतना कठिन था, की इसके बदले मैं कोई भी कठिन से कठिन दंड भोगने के तैयार था, पर माँ की आदेश का अवहेलना करना असंभव था। इसलिए यह कष्टकर काम मुझे ही करना पड़ा। जिस बुधी के साथ बचपन से लेकर अबतक खेलते हुए, चरते हुए, नहलाते हुए, खाना खिलते हुए और बेल लेकर शैतानी करते हुए गुजरा था, उसी बुधी को एक हाथ में बेल लेकर और दुसरे हाथ में रस्सी लेकर मैं जा रहा था उस गावं की ऑर जहाँ से शायद वह कभी लौट कर नहीं आएगी।
- सारा रास्ता बुधी चुपचाप मेरे साथ उस गावं की ऑर चल दी...क्या वह इस बिश्वाश के साथ मेरे साथ जा रही थी की मैं उसे किसी मैदान में घास चरने के लिये ले जा रहा हूँ ? नहीं, तब मेरे हांथों में बेल नहीं होता।
- आखिर जब मैं गावं के पास पहुंचा तब अपने हांथो से पहले उसे उस बेल को खिलाया, आज मैं उसे बेल से ललचा नहीं पाया, वल्कि बेल को तोड़कर खुद ही उसके मुहं के पास पकडे रहा ताकि उसे खाने में असुविधा न हो।
- उसका खाना ख़त्म होते ही मैं रस्सी को उस आदमी के हाँथ में पकड़कर बिना पीछे मुड़कर देखे दौड़ते हुए लौट गया।
- मैं घर तक पहुँच भी नहीं पाया था की बुधी अपनी चिर-परिचित आवाज से रंभाते हुए घर पर लौट आई थी।
- दुसरे दिन पिताजी खुद ही उस आदमी के साथ बुधी को लेकर गावं तक गये और अपने मित्र को उसे सौंप कर लौट आये। समय के साथ-साथ बुधी हमलोगों को भूल गयी। लेकिन नहीं....
- कई साल बाद एक विवाह समारोह में हम सभी उन्ही सज्जन के घर पर गये.... आँगन के एक कोने में बुधी को देखकर मेरी छोटी बहन आनंदातिरेक में चिल्लाई " माँ, भैया, देखो वह बुधी है न..." बुधी भी हमलोगों का आवाज सुनकर अपनी नांद में से अपनी मुह उठाकर देखी... माँ के साथ-साथ हम लोग भी उसके पास गये... माँ जैसे ही उसकी माथे को सहलाने लगी, वह भी अपनी जीभ से माँ को सहलाने लगी...
- बुधी की आँखों से अंशु लगातार बह रहे थे... माँ के साथ-साथ-साथ हम सभी भी रो रहे थे।
आज इतना ही। आगे की कहानी फिर कभी। शुभ रात्रि।
- बुधी को बेल खाना बेहद पसंद था... कभी-कभी वह घास चरति हुई दूर निकल जाती थी। शाम तक घर नहीं लौटने पर, उसे लाने के लिए मुझे भेज दिया जाता था। मुझे पता रहता था की वह किस तरफ गयी होगी।
- उसे ले आने से पहले मैं पास के पेड़ से एक बेल तोड़ लिया करता और दोनों हथेलियों को मुहं के पास घेरा बनाकर एक विशेष दिशा की ऑर करके, जोर से उसका नाम लेकर चिल्लाता... "बू...ध...ई...ई..." दूर कहीं से उसकी आवाज सुनाई पड़ती...." ह...म...म..आ...आ...आ.." बुधी पूंछ खड़ी करके अपनी सर को हिलाती हुई दौड़ती आती दिखाई पड़ती। मैं उसे बेल दिखाते हुए दौड़ पड़ता घर की ऑर... घर पर आकर भी, उसे तंग करने के लिए कुछ देर तक बेल को उसके मुहं के पास ले जाकर ऊपर-नीचे करता रहता.... आखिर तंग आकर वह अपने छोटे-छोटे सींगो वाली माथा से मुझे दीवाल पर दबाकर खड़ी हो जाती... मुझे चिल्लाते हुए सुनकर, माँ आँगन में निकल आती और मुझे डांटते हुए बेल लेकर उसे दे देती थी। कई बार किसी शैतानी के कारण यदि माँ हम में से किसी को मारने लगती तो बुधी माँ पर भी खफा हो जाती और अपने माथे से उसे ठेल दिया करती... माँ हंसती हुई कहती... " तू तो बच्चों को बिगाड़ देगी, शैतानी करेगा तो मारूंगी नहीं ?" वह सर हिलाती रहती। जैसे कहा रही हो की "हाँ, इन्हें मत मारो ..." अक्सर ऐसा लगता था की वह हमारी सभी बातों को समझती है केवल शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाती।
- दोपहर के भोजन के समय भी वह हाजीर रहती थी, उसे भी मिटटी के एक छोटे वर्तन में दाल-भात और सब्जियां दी जाती थी। दशहरा के समय जब हमारे लिए नये कपडे लाये जाते थे तब उसके गले में भी बड़ी कंचों की मोतियों की माला और सींगों पर लाल रिबोन बांधा जाता था।
- पडोश के लोग मजाक में कहते... "ये तो भैया की एक और लड़की है"
- दूध सी सफ़ेद, बुधी के, सींगों के बीचों-बीच माथे पर मयूर पंख जैसा एक काला दाग था। बुधी सुध्ध देशी गाय थी। इसलिए उसके सिंग भी छोटे-छोटे थे। हर एक-दो दिन के अंतराल पर मैं या पिताजी उसे नदी पर नहाने ले जाया करते थे। नहाना उसे खूब पसंद था। घर के सभी का प्यार और जतन से उसका सौंदर्य दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा था। कभी-कभी वह पास के सब्जियों के खेत में भी घुस जाया करती। कई बार उसे लोग अथक प्रयास से पकड़कर कांजी हायूस में बंद कर दिया करते थे। शाम तक जब वह घर नहीं लौटती तब दुसरे ही दिन पिताजी कांजी हायूस पहुँच जाते और कुछ रुपये दंड देकर उसे छुड़ाकर ले आया करते।
- ऐसा ही एक बार उसे लाते समय, जब वह मोहल्ले में पहुँच गयी, तो पहचाने हुए रास्ते को देखकर घर आने के लिए दौड़ पड़ी.... पिताजी रस्सी के झटके को संभाल नहीं पाए और रास्ते के किनारे पड़े हुए एक टूटे कांच के बोतल पर गिर पड़े.... उनकी हथेली काफी गहराई तक कट गयी। पिताजी पास के ही एक दवा दुकान से हाँथ पर पत्तियां बंधवा कर लौटे। उन्होंने आकर देखा की बुधी अपने नांद में में से खा रही थी। दो-तिन दिन की भूखी बुधी का पेट अब तक भर चूका था। पिताजी को देखकर वह उनके पास आई और उनके चोट लगे हांथो को अपने जीभ से सहलाने लगी।
शायद पहली बार हम बच्चों ने पिताजी के आँखों में आंशु देखे थे....
- अगले ही वर्ष बुधी एक बच्ची की माँ बन गयी थी.... हम सभी उसके बछिया को देखकर खुश हो गए थे।
- दूध निकलने के लिए उसके पैरों को कभी बांधा नहीं जाता था। वैसे भी वह कुल्लम दो-तीन किलो से अधिक दूध नहीं देती थी। उसपर माँ और पिताजी भी, इस बात का ध्यान रखते थे, की उसके बच्चे के लिए दूध कम न पड जाये। ठण्ड के दिनों में एक पुराने कम्बल को उसके पीठ पर बांध दिया जाता था। उस समय अमीरों के घर पर ही बिजली के पंखों का चलन हुआ करता था। हमारे घर पर बिजली के पंकें नहीं थे। अन्यथा शायद पिताजी उसके रहने के जगह पर पंखा भी लगा देते।
- बुधी, इसी तरह आराम और अपनत्व भरी जीवन जी रही थी।
- विगत दो-तिन सालों से इस राज्य पर भगवान् ईन्द्रदेव की कृपा दृष्टि नहीं हुई थी। वर्षा पर निर्भर इस राज्य में पैदावार नहीं के बराबर हुई थी। सूखे की मार से जनता त्राहि-त्राहि कर रही थी। हमारे कसबे के बाजार से अनाज गायब हो गए थे। जितने भी मिल रहे थे उसके दाम आसमान छू रहे थे। उसे खरीदकर खाने की आर्थिक स्थिति अधिकतर लोगों में नहीं था। दूर-दूर तक, सूखे हुए खेतों में कई वर्षों तक पानी की कमी से दरारें पड़ चुके थे। नदी, तालाव और आस-पास के सभी कुवें पूरी तरह सुख चुके थे। बड़े-बड़े पेड़ो में अभी भी कुछ पत्तियां दीख जाता था। झाड़ियों के पत्ते सुख कर नीचे पड़े हुए थे। सूखे मैदान और खेतों में गाय, भैंशे, बकरियां और दुसरे जानवर भूख से व्याकुल होकर घूम रहे थे। शायद कहीं कुछ घास-पत्ती नजर आ जाये, और वे कई दिनों से खाली पेट में कुछ डाल सकें। कहीं भी दूर से हरी पत्तियां दिख जाता तो सभी उस पर टूट पड़ते। बड़े-बड़े सिंग वाले ही अक्सर इन पत्तियों को खाने में सफल हो पाते थे ।
- अनाज के साथ-साथ पानी के लिए भी हाहाकार मची हुई थी। नगरपालिका के नल पर एक निश्चित समय तक ही पानी की आपूर्ति की जा रही थी। मोहल्ले में एक ही नल था, जिस पर रात रहते ही लोग बाल्टियों और हांडियों के कतार लगा देते थे। दस आदमी के उपयोग लायक पानी को सौ लोगों में बांटा जाता था। किसी को भी पीने लायक पानी भी पूरा नहीं पड़ता। नल पर- लगभग रोज ही गाली -गलौज, और मार-पिट लगा ही रहता था।
यह क़स्बा नुमा शहर एक पहाड़ी नदी के किनारे बसा था। जिनके घर नदी के किनारे या आस-पास ही थे, वे सुखी नदी के बालू को खोद कर पानी निकालते और सावधानी से उस पानी को अपने हांडियों में साफ़ कपड़ों से छानकर इकठ्ठा कर लेते।
- दिन गुजर रहे थे और अगला दिन और भयावह बनता जा रहा था। लगभग रोज ही इस शांत कसबे में कई लूट और चोरी-डकैती की वारदातों की खबर आ रही थी।
- पिताजी को अपनी साधारण आय से घर चलाना दिनों-दिन कठिन होता जा रहा था। अक्सर हमें भूखे ही रहना पड़ रहा था। राशन के दुकान पर मिलने वाले चावल और गेहूं के लिए घंटों हम बच्चे पारा- पारी लाईन में खड़े रहते। अधिकतर दिन खाली हाँथ लौटना पड़ता। जब भी कहीं से खबर मिलता की अमुक जगह मुफ्त में गेहूं की दलिया, चावल या पौडर दूध मिल रहा है तो हम बच्चे छोटे-छोटे झोले लेकर पहुँच जाते। मुफ्त में पाए जाने वाले उन चावलों में इतनी दुर्गन्ध होती थी की निगलना असंभव लगता था लेकिन भूख..... निगलने तक ही ख़राब लगता... गले से निचे उतारते ही सब ठीक हो जाता था।
अपना ही ये हाल था तो बुधी के लिए चारा, भूषि कहाँ से आ पाता...? इनके दाम भी इतने अधिक हो गए थे की उसे खरीदकर खिलाना पिताजी के सामान्य रोजगार में संभव नहीं हो पा रहा था।
- अक्सर पिताजी या माँ भूख नहीं रहने का बहाना करके, अपने हिस्से के चावल-दाल बुधी के नांद में ड़ाल दिया करते थे।
- बड़े होने के बाद, समझ में आया था की क्यों उनको भूख नहीं लगती थी....
- फिर भी बुधी और उसकी बछिया दुबलाती जा रही थी। माँ-पिताजी के साथ-साथ हम बच्चों का स्वस्थ भी दिनों-दिन कमजोर पड़ता जा रहा था। बुधी के साथ-साथ हम बच्चों के दुबले और हड्डियाँ निकले हुए शारीर को देखकर माँ और पिताजी की रातों की नींद और दिन का चैन शेष होता जा रहा था।
- आखिर एक दिन वे आपस में सलाह करके बुधी को किसी ऐसे व्यक्ति के पास भेजना तय किये जहाँ उसे भर पेट भोजन मिल सके।
- कसबे से दो-तिन मिल दूर एक छोटा गावं था। वहां एक सज्जन के पास कई गाये -भैंसे थी । वे पिताजी के मित्रों में से ही थे, इसलिए वे बुधी को अपने पास रखने के लिए राजी हो गये।
एक-दो दिन बाद उनका एक आदमी आया बुधी को ले जाने के लिये। पिताजी को पता था की उनका आदमी किस दिन बुधी को ले जायेगा। इसलिए वे सुबह ही किसी को कुछ बताये बिना घर से निकल गये थे। उस अनजान आदमी को देखते ही, बुधी को जैसे इस घर से हमेशा के लिये जाने का पुर्बाभास हो गया था। वह आदमी बुधी को ले जाने के लिये उसका रस्सी पकड़कर खींचने का कोशिश करने लगा... पर बुधी अपने दुर्वल शारीर की सारी शक्तियों को इकठ्ठा करके, चारों पैरों को आँगन में जमाकर खड़ी हो गयी। वह आदमी जब उसे ले जाने में असफल रहा, तो एक छड़ी से पीट कर उसे ले जाने का प्रयास किया। हम सभी जोर-जोर से रो रहे थे और माँ से विनती कर रहे थे बुधी को नहीं ले जाने देने के लिये.... पर उनके मजबूरी को समझने लायक उम्र हमारी नहीं थी। माँ खुद भी रो रही थी... आखिर माँ ने ही तो उसे इतने सालों से पाल-पोसकर बड़ी किये थे। अचानक, उस आदमी द्वारा बुधी को पिटते देखकर मेरी अत्यंत शांत माँ की जोर से बोलते हुए सुना..." ऐ, ख़बरदार उसे मारा तो..." शायद पहली बार माँ को इतनी जोर से किसी को डांटते हुए सुना था। उनका आवाज सुनकर हम डर से खुद ही रोना बंद कर दिए थे...
- बुधी अपनी असहाय, दुर्वल, और निरीह बड़ी-बड़ी आँखों से, जो भूख और कमजोरी के कारन अब अन्दर की ऑर धंश गया था, को उठाकर माँ की ऑर देख रही थी... जैसे कह रही हो की, मुझे किस दोष के कारन अपने से अलग कर रही हो.....?
- फिर सबसे कष्टकर समय मेरे लिये आया। जब माँ का आदेश हुआ- "मुन्ना, तू ही बुधी को लेकर जा, गावं के पास जाकर रस्सी इसके हाँथ में दे देना और जल्दी लौट आना"
- मेरे लिये यह काम इतना कठिन था, की इसके बदले मैं कोई भी कठिन से कठिन दंड भोगने के तैयार था, पर माँ की आदेश का अवहेलना करना असंभव था। इसलिए यह कष्टकर काम मुझे ही करना पड़ा। जिस बुधी के साथ बचपन से लेकर अबतक खेलते हुए, चरते हुए, नहलाते हुए, खाना खिलते हुए और बेल लेकर शैतानी करते हुए गुजरा था, उसी बुधी को एक हाथ में बेल लेकर और दुसरे हाथ में रस्सी लेकर मैं जा रहा था उस गावं की ऑर जहाँ से शायद वह कभी लौट कर नहीं आएगी।
- सारा रास्ता बुधी चुपचाप मेरे साथ उस गावं की ऑर चल दी...क्या वह इस बिश्वाश के साथ मेरे साथ जा रही थी की मैं उसे किसी मैदान में घास चरने के लिये ले जा रहा हूँ ? नहीं, तब मेरे हांथों में बेल नहीं होता।
- आखिर जब मैं गावं के पास पहुंचा तब अपने हांथो से पहले उसे उस बेल को खिलाया, आज मैं उसे बेल से ललचा नहीं पाया, वल्कि बेल को तोड़कर खुद ही उसके मुहं के पास पकडे रहा ताकि उसे खाने में असुविधा न हो।
- उसका खाना ख़त्म होते ही मैं रस्सी को उस आदमी के हाँथ में पकड़कर बिना पीछे मुड़कर देखे दौड़ते हुए लौट गया।
- मैं घर तक पहुँच भी नहीं पाया था की बुधी अपनी चिर-परिचित आवाज से रंभाते हुए घर पर लौट आई थी।
- दुसरे दिन पिताजी खुद ही उस आदमी के साथ बुधी को लेकर गावं तक गये और अपने मित्र को उसे सौंप कर लौट आये। समय के साथ-साथ बुधी हमलोगों को भूल गयी। लेकिन नहीं....
- कई साल बाद एक विवाह समारोह में हम सभी उन्ही सज्जन के घर पर गये.... आँगन के एक कोने में बुधी को देखकर मेरी छोटी बहन आनंदातिरेक में चिल्लाई " माँ, भैया, देखो वह बुधी है न..." बुधी भी हमलोगों का आवाज सुनकर अपनी नांद में से अपनी मुह उठाकर देखी... माँ के साथ-साथ हम लोग भी उसके पास गये... माँ जैसे ही उसकी माथे को सहलाने लगी, वह भी अपनी जीभ से माँ को सहलाने लगी...
- बुधी की आँखों से अंशु लगातार बह रहे थे... माँ के साथ-साथ-साथ हम सभी भी रो रहे थे।
Saturday, December 11, 2010
नकफुल
आज की सुबह रोज की तरह नहीं था। आस पास के सात आठ गावों में जैसे उत्सव मनाया जा रहा था। सभी अपने सबसे कम फटे हुए कपड़ों में से जो सबसे साफ़ था को पहनकर तैयार हो चूका था। सुबह की हवा और पेड़ पौधे भी जैसे इस उत्सव में शामिल हो गए थे।
पता चला की सरैदिहा गावं के बुधना उरांव अपनी जमीन का जो आधा हिस्सा सरकार को स्कूल बनाने के लिए दान में दिया था, उसी जमीन पर सरकार द्वारा एक प्राथमिक ईस्कुल बना दिया गया है। आज उसका उद्घाटन है।
गावं के सभी ने मिलकर विद्यालय के प्रांगन और आस-पास के जगह को साफ करके गोबर से लिप कर तैयार कर दिया था। तालावों और जंगलों में मिलने वाले फुल, पत्तियों, केले के पौधों से विद्यालय को सजाया गया था।
सर्व शिक्षा अभियान के निदेशक श्री बंशीधर बाबु की इच्छा थी की इस विद्यालय का उद्घाटन उन्ही से करवाया जाए, जिनके पति ने विद्यालय की स्थापना के लिए अपनी थोड़ी सी जमीन में से आधा हिस्सा दान दिया था। मुखिया जी की भी यही इच्छा थी।
बुधना उरांव की विधवा सोमरी उरयीन को खबर दिया जा चूका था। विद्यालय प्रांगन में सौ दो सौ महिला, पुरुष और बच्चे उसका इंतजार कर रहे थे......
गावं के सभी बड़े और बच्चे सोमरी नानी का बेहद इज्जत करते थे। सभी जानते थे की उनके एक मात्र लड़के के साथ क्या हुआ था और क्यों बुधना अपनी जमीन को विद्यालय बनाने के लिए सरकार को दान दिया था।
सोमरी अपनी फूस की झोपडी में आज अपने पुत्र और पति की याद में आंशु बहा रही थी। आज वह अकेली थी, लेकिन कभी उसका भी तो एक हँसता मुस्कुराता परिवार था। वह सोच रही थी, कितने दिन हो गए ?.... हाँ, दस साल.... उसे ऐसा लग रहा था जैसे कुछ ही दिन पहले की ही तो बात है, जब उसका बेटा पैदा हुआ.... मंगल वार का दिन था.... उसे याद है.... बुधना उस गोल-मटोल बेटे को गोद में लेकर तो जैसे पागल ही हो गया था.... नामकरण के दिन उसने गावं के सभी को नेओता दिया था.... सब को भर पेट भात, मांश और हडिया खिलाया था। गावं का पाहन बेटे का नाम रखा था मंगरा.... शुभ दिन- शुभ नाम ???? बुधना खुद भी हडिया पीकर मतवाला हो गया था। खूब जोर-जोर से, चिल्लाकर सबको बता रहा था, की वह बेटा को खूब पढ़ायेगा.... फिर उसका बेटा मास्टर बनकर आस-पास के गावं के बच्चों को पढ़ायेगा ......बुधना सपना खूब देखता था ... उसके याद में सोमरी के आँखों में आंशुं के साथ-साथ होंठों में हंशी भी आ गया।
फिर वह दिन आया जब बुधना छे साल के मंगरा को साईकिल पर बैठाकर तिन कोस दूर रनियां गावं में ले गया था, ईस्कूल में भर्ती करने। बेटा पढ़ लेगा तो औरों को भी पढ़ायेगा, सूद खोर बनिया और सरकारी बाबु लोग, जो गावं के अनपढ़ लोगों को कानून का डर दिखाकर लुटता है उनसे बचाएगा। तबतक ऐसा कोई भी तो नहीं था, जो इतना भी पढ़ालिखा हो की बनिया के उधारी का हिसाब या सरकारी बाबुओं के बातों को समझ सके।
बनिया को बुधना के इरादे का पता चल गया था, प्रखंड कर्मचारी भी नहीं चाहता था की गावं का कोई भी पढ़-लिख सके क्योंकि इससे तो उनके कुत्सित चाल को अंजाम तक पहुँचाना संभव नहीं हो पायेगा। इसलिए उनके लिए यह जरुरी था की शीक्षा का बीज पनपने से पहले ही मिटा दिया जाये।
बुधना फिर कभी रनियां के इस्कूल तक बेटे को लेकर पहुँच नहीं पाया। बनिया के गुंडे उन दोनों को रस्ते में ही ......
कितना रोई थी सोमरी........ उन दोनों का लाश जब गावं में लाया गया , तो खून से सने बाप-बेटे को देखकर सोमरी केवल हाय, ही कह पाई थी...... सदमे से वह अचानक चुप हो गयी थी.... आंशु जैसे उसके आँखों तक आकर सुख चुके थे..... सभी जानते थे की उनके साथ कौन और क्यों ऐसा किया था। लेकिन गावं के अधिकतर लोग, इतना की मुखिया तक बनिया का कर्जदार था. इसलिए सब कुछ जानते हुए भी वे चुप थे। सबसे ज्यादा हाय -हाय तो बनिया ही किया था...... उसका मंशा तो कुछ और भी था, पर जंगलों में पली बड़ी मजबूत देह काठी के सोमरी को काबू करना आसान नहीं था। बनिया इस मामले को अपने स्तर से ही थाने में जाकर दारोगा को कुछ ले देकर ख़त्म कर चूका था। वह काफी दिनों तक बुधना के बाकि बचे जमीन को हथियाने का कोशिश किया, पर एकमात्र बुधना ही तो था जो उसका कर्जदार नहीं था। इसलिए उसका कोशिश बेकार गया। गावं के लोग भी सोमरी के पीछे थे, इसलिए भी वह सोमरी को परेशान करने का साहस नहीं कर सका।
उरयिन को तब तक तो यह भी पता नहीं था की जमीन का आधा हिस्सा बुधना इस्कूल बनाने के लिए सरकार को दे चूका है। वह तो गावं के लोगों की सहायता से उस जमीन पर दो साल पहले तक खेती-बारी कर रही थी। पति और लड़के को भूलने के लिए, वह सूरज उगने से पहले ही खेत में पहुँच जाती और शाम तक खेत में ही गुजार देती थी। गावं के सभी उसे हर तरह से सहायता करते थे। उस अकेली जान के लिए खेत का पैदावार काफी से भी ज्यादा था। फसल के दो तिहाई हिस्सा वह गावं के जरुरतमंदो को बाँट दिया करती थी। बचा हुआ अपने लिए रखती थी।
उस दिन की बात उसे आज तक याद है जब उसके जमीं पर कुछ सरकारी आदमी कुदाल और फावरा लेकर आये थे और बताया था की वहां एक इस्कूल बनेगा। सुनकर वह काफी देर तक ठगा सा खड़ी रही थी। फिर जब मुखिया जी ने कहा था की बुधना उस जमीन को इस्कूल बनाने के सरकार को दिया है तब उसे पता चला था की उसका पति अनपढ़ होकर भी कितना समझदार था। इस्कूल बनाने वाले साहब ने जब उसे उद्घाटन के दिन पहला इंटा रखने के लिए कहा था......
सुबह पास के तालाव से नहाकर वह झोपडी में आयी थी। न जाने कितने दिनों के बाद.... शादी के समय, मायके से लाई टिन के बक्शे को खोलकर देख रही थी... उसके शादी का जोड़ा और बुधना का धोती-कुरता, उसमे रखे हुए उसका बांशुरी। जवान बुधना का चेहरा और उसके साथ बिताये वे खुशियों के पल... जब वह पहली बार बुधना के साथ सरहुल के मेले में गयी थी और सहेलियों के साथ मांदर और बांशुरी के धुन पर नाची थी....
आज जैसा ही, उस दिन भी, वह अपने कमर तक लहराते काले बालों में खूब सारा करंज का तेल लगाकर इसी तालाव से नहाकर झोपडी में आई थी। लाल किनारी के दूध सा सफ़ेद साड़ी को उसने अपने सांचे में ढले हुए शरीर पर बांधकर, पैरों में लाल आलता और निकल के पायल पहनकर वह लगभग तैयार हो गयी थी ... सरहुल के मेले में जाने के लिए.... बुधना उसी समय कहीं से दौड़ता हुआ आया था और सजी संवरी उसे देखकर जैसे ठगा सा खड़ा रहा गया था .... मुस्कुराते हुए वह फिर बाहर निकला और लाल पलाश के फूलों का डाल तोड़कर ले आया...
सोमरी के जुड़े में एक-एक फूल को करीने से सजाकर, उसके चेहरे को अपने दोनों हांथों में लेकर वह काफी देर तक उसे देखता रहा था.... " सोमरी, तोएं तो बहुते खपसुरत हे..." सोमरी, शर्मा कर उसके छाती में अपने चेहरे को छुपा ली थी। सरहुल के मेले में वे दोनों अपने संगी-साथी के साथ बांशुरी और मांदर के धुन पर घंटों नाची थी... अभी भी जैसे वे धुन उसके कानों में सुनाई दे रहे थे....
बुधना के पास आज काफी रुपये थे। मेले में वे दोनो खूब मजा किये थे। झूले में झुलना, फिरकी में घूमना, फिर चूड़ियों के दुकान में लाल-पीले चूड़ियों को पहनकर इतराना... अचानक बुधना उसे खींचते हुए एक सोनार के दुकान में ले गया था और सोने का एक नक् फूल अपने हांथों से उसके नाक में पहना दिया था.... और फिर निर्निमेष दृष्टि से उसे देखता रहा था....
सोमरी की ऊँगली आज खुद व खुद उस नक् फूल को छू रहा था... बुधना के स्पर्श को वह महसूस कर रही थी।
सोमरी उसे चुंटी काट कर होश में लायी- "अब चल न, लौटे के वेर हो गया..."
लौटते समय तक, बुधना-सोमरी और उनके सभी संगी-साथी हडियाँ के नशे में मतवाला हो गए थे। हर दस-बीस कदम पर बुधना उसे अपने अंकों में खिंच लेता और उसके चेहरे को देखते हुए... खिलखिलाकर हंस पड़ता था ... और चिल्लाते हुए कह रहा था..." तोएं सब जाने सुन, हमर सोमरी से खपसुरत अऊर कोई नाहीं.... हाँ की ना?" सब संगी-साथी उसके हाँ में हाँ मिलते हुए कह रहे थे... " हाँ, रे बुधना हाँ, तोर सोमरी मन से खपसुरत अऊर कोई नाहीं" कहते-कहते सब मिलकर खूब हंस रहे थे। वेचारी सोमरी लाज के मारे दुहरी हुई जा रही थी। लेकिन बुधना पर इसका कोई असर नहीं हो रहा था। जंगल के रास्ते में एक जगह बुधना रुक गया और बाकि सबको भी ठहरने के लिए कहा, और पास के फूलों से लदे एक सखुए के पेड़ पर चढ़ गया.... सखुए के फूलों की एक डाल तोड़कर नीचे उतरा और सोमरी को एक पत्थर पर बैठाकर उसके जुड़े से मुरझाये हुए पलाश के फूलों को निकालकर सखुए के ताजे फूलों को करीने से सजाने लगा.... फूलों से सजी सोमरी को देखते हुए वह फिर अपने संगी-साथी को बुलाकर कहा था.... " हमर, सोमरी से...." वाक्य पूरा होने से पहले ही सब कह रहे थे "आउर, कोई नाहीं"
बुधना अभी भी सोमरी के चेहरे को निहार ही रहा था। शाम के समय जंगल में अँधेरा कुछ जल्दी ही पसर जाता है। भालू और तेंदुए के निकलने की संभावना भी रहता है। इसलिए संगी-साथी जल्दी गावं लौटने के लिए हडबडा रहे थे। वे बुधना और सोमरी को वर्तमान में लाने के लिए चिल्लाते हुए कहने लगे- " चल रे बुधना, जल्दी-जल्दी घरे चल, फिर भर चाँद के इन्जोरा में सोमरी मन के देखत रहबे"
ऐसा ही हुआ भी था- भोर होने तक बुधना उसके सौंदर्य को निहारता ही रह गया था....
झोपडी के दरवाजे पर बच्चों की कोलाहल सुनकर वह वर्तमान में लौट आई.... बच्चे कह रहे थे- " ए नानी, जल्दी इस्कूल के मैदान में चल ना, सब तोरे ला रुकल हाउ "
" हाँ, बाबु, चल" कहते हुए उसने अपनी झोपडी के दरवाजे को भिडाकर बच्चों के साथ इस्कूल के मैदान की ओर चल पड़ी।
निदेशक महोदय उसी का प्रतीक्षा कर रहे थे। सोमरी को लेकर उन्होंने उद्घाटन के जगह पर आये। छोटी सी गड्ढे में एक नयी ईंट रखी हुई थी , निदेशक महोदय सोमरी के एक हाँथ में एक नयी ईंट और दुसरे में सीमेंट-बालू मिश्रित एक कोरनी देकर कहा- " आप इस सीमेंट -बालू के मिश्रण को इस ईंट में रखकर दुसरे ईंट को इसपर रख दीजिये"
-सोमरी कुछ देर तक ईंट और मिश्रण से भरे कोरनी को हाँथ में लेकर खड़ी रही। फिर दोनों को नीचे रख दिया।
- उसे याद आया, नक् फूल को पहनते समय बुधना उसे कहा था- " इ नक् फूल को तोयें कबहूँ नाहीं उतारबे "
- सोमरी सोच रही थी- बुधना के सपने से अधिक कीमत तो इस नक् फूल का नहीं है।
उसने अपने नाक से नकफुल को काफी प्रयास से निकाली और साड़ी से उसे अच्छी तरह पोंछकर चमकाई, चम्-चमाते नक् फूल को कुछ देर तक ध्यान से एकटक देखती रही... फिर उसे गड्ढे में रखे ईंट पर रख कर सीमेंट-बालू के मिश्रण और दूसरी ईंट को रख कर उद्घाटन प्रक्रिया को पूरा किया।
बुधना के सपने के साथ उसने इस नकफुल के जरिये खुद को को भी इस सपने का हिस्सा बना ली थी।
क्या उसकी दो बूंद आंशु भी उस नक् फूल के साथ उद्घाटन के नयी ईंट पर गिरा था....?
लेकिन हाँ.... बुधना का सपना तो पूरा हो ही गया था।
पता चला की सरैदिहा गावं के बुधना उरांव अपनी जमीन का जो आधा हिस्सा सरकार को स्कूल बनाने के लिए दान में दिया था, उसी जमीन पर सरकार द्वारा एक प्राथमिक ईस्कुल बना दिया गया है। आज उसका उद्घाटन है।
गावं के सभी ने मिलकर विद्यालय के प्रांगन और आस-पास के जगह को साफ करके गोबर से लिप कर तैयार कर दिया था। तालावों और जंगलों में मिलने वाले फुल, पत्तियों, केले के पौधों से विद्यालय को सजाया गया था।
सर्व शिक्षा अभियान के निदेशक श्री बंशीधर बाबु की इच्छा थी की इस विद्यालय का उद्घाटन उन्ही से करवाया जाए, जिनके पति ने विद्यालय की स्थापना के लिए अपनी थोड़ी सी जमीन में से आधा हिस्सा दान दिया था। मुखिया जी की भी यही इच्छा थी।
बुधना उरांव की विधवा सोमरी उरयीन को खबर दिया जा चूका था। विद्यालय प्रांगन में सौ दो सौ महिला, पुरुष और बच्चे उसका इंतजार कर रहे थे......
गावं के सभी बड़े और बच्चे सोमरी नानी का बेहद इज्जत करते थे। सभी जानते थे की उनके एक मात्र लड़के के साथ क्या हुआ था और क्यों बुधना अपनी जमीन को विद्यालय बनाने के लिए सरकार को दान दिया था।
सोमरी अपनी फूस की झोपडी में आज अपने पुत्र और पति की याद में आंशु बहा रही थी। आज वह अकेली थी, लेकिन कभी उसका भी तो एक हँसता मुस्कुराता परिवार था। वह सोच रही थी, कितने दिन हो गए ?.... हाँ, दस साल.... उसे ऐसा लग रहा था जैसे कुछ ही दिन पहले की ही तो बात है, जब उसका बेटा पैदा हुआ.... मंगल वार का दिन था.... उसे याद है.... बुधना उस गोल-मटोल बेटे को गोद में लेकर तो जैसे पागल ही हो गया था.... नामकरण के दिन उसने गावं के सभी को नेओता दिया था.... सब को भर पेट भात, मांश और हडिया खिलाया था। गावं का पाहन बेटे का नाम रखा था मंगरा.... शुभ दिन- शुभ नाम ???? बुधना खुद भी हडिया पीकर मतवाला हो गया था। खूब जोर-जोर से, चिल्लाकर सबको बता रहा था, की वह बेटा को खूब पढ़ायेगा.... फिर उसका बेटा मास्टर बनकर आस-पास के गावं के बच्चों को पढ़ायेगा ......बुधना सपना खूब देखता था ... उसके याद में सोमरी के आँखों में आंशुं के साथ-साथ होंठों में हंशी भी आ गया।
फिर वह दिन आया जब बुधना छे साल के मंगरा को साईकिल पर बैठाकर तिन कोस दूर रनियां गावं में ले गया था, ईस्कूल में भर्ती करने। बेटा पढ़ लेगा तो औरों को भी पढ़ायेगा, सूद खोर बनिया और सरकारी बाबु लोग, जो गावं के अनपढ़ लोगों को कानून का डर दिखाकर लुटता है उनसे बचाएगा। तबतक ऐसा कोई भी तो नहीं था, जो इतना भी पढ़ालिखा हो की बनिया के उधारी का हिसाब या सरकारी बाबुओं के बातों को समझ सके।
बनिया को बुधना के इरादे का पता चल गया था, प्रखंड कर्मचारी भी नहीं चाहता था की गावं का कोई भी पढ़-लिख सके क्योंकि इससे तो उनके कुत्सित चाल को अंजाम तक पहुँचाना संभव नहीं हो पायेगा। इसलिए उनके लिए यह जरुरी था की शीक्षा का बीज पनपने से पहले ही मिटा दिया जाये।
बुधना फिर कभी रनियां के इस्कूल तक बेटे को लेकर पहुँच नहीं पाया। बनिया के गुंडे उन दोनों को रस्ते में ही ......
कितना रोई थी सोमरी........ उन दोनों का लाश जब गावं में लाया गया , तो खून से सने बाप-बेटे को देखकर सोमरी केवल हाय, ही कह पाई थी...... सदमे से वह अचानक चुप हो गयी थी.... आंशु जैसे उसके आँखों तक आकर सुख चुके थे..... सभी जानते थे की उनके साथ कौन और क्यों ऐसा किया था। लेकिन गावं के अधिकतर लोग, इतना की मुखिया तक बनिया का कर्जदार था. इसलिए सब कुछ जानते हुए भी वे चुप थे। सबसे ज्यादा हाय -हाय तो बनिया ही किया था...... उसका मंशा तो कुछ और भी था, पर जंगलों में पली बड़ी मजबूत देह काठी के सोमरी को काबू करना आसान नहीं था। बनिया इस मामले को अपने स्तर से ही थाने में जाकर दारोगा को कुछ ले देकर ख़त्म कर चूका था। वह काफी दिनों तक बुधना के बाकि बचे जमीन को हथियाने का कोशिश किया, पर एकमात्र बुधना ही तो था जो उसका कर्जदार नहीं था। इसलिए उसका कोशिश बेकार गया। गावं के लोग भी सोमरी के पीछे थे, इसलिए भी वह सोमरी को परेशान करने का साहस नहीं कर सका।
उरयिन को तब तक तो यह भी पता नहीं था की जमीन का आधा हिस्सा बुधना इस्कूल बनाने के लिए सरकार को दे चूका है। वह तो गावं के लोगों की सहायता से उस जमीन पर दो साल पहले तक खेती-बारी कर रही थी। पति और लड़के को भूलने के लिए, वह सूरज उगने से पहले ही खेत में पहुँच जाती और शाम तक खेत में ही गुजार देती थी। गावं के सभी उसे हर तरह से सहायता करते थे। उस अकेली जान के लिए खेत का पैदावार काफी से भी ज्यादा था। फसल के दो तिहाई हिस्सा वह गावं के जरुरतमंदो को बाँट दिया करती थी। बचा हुआ अपने लिए रखती थी।
उस दिन की बात उसे आज तक याद है जब उसके जमीं पर कुछ सरकारी आदमी कुदाल और फावरा लेकर आये थे और बताया था की वहां एक इस्कूल बनेगा। सुनकर वह काफी देर तक ठगा सा खड़ी रही थी। फिर जब मुखिया जी ने कहा था की बुधना उस जमीन को इस्कूल बनाने के सरकार को दिया है तब उसे पता चला था की उसका पति अनपढ़ होकर भी कितना समझदार था। इस्कूल बनाने वाले साहब ने जब उसे उद्घाटन के दिन पहला इंटा रखने के लिए कहा था......
सुबह पास के तालाव से नहाकर वह झोपडी में आयी थी। न जाने कितने दिनों के बाद.... शादी के समय, मायके से लाई टिन के बक्शे को खोलकर देख रही थी... उसके शादी का जोड़ा और बुधना का धोती-कुरता, उसमे रखे हुए उसका बांशुरी। जवान बुधना का चेहरा और उसके साथ बिताये वे खुशियों के पल... जब वह पहली बार बुधना के साथ सरहुल के मेले में गयी थी और सहेलियों के साथ मांदर और बांशुरी के धुन पर नाची थी....
आज जैसा ही, उस दिन भी, वह अपने कमर तक लहराते काले बालों में खूब सारा करंज का तेल लगाकर इसी तालाव से नहाकर झोपडी में आई थी। लाल किनारी के दूध सा सफ़ेद साड़ी को उसने अपने सांचे में ढले हुए शरीर पर बांधकर, पैरों में लाल आलता और निकल के पायल पहनकर वह लगभग तैयार हो गयी थी ... सरहुल के मेले में जाने के लिए.... बुधना उसी समय कहीं से दौड़ता हुआ आया था और सजी संवरी उसे देखकर जैसे ठगा सा खड़ा रहा गया था .... मुस्कुराते हुए वह फिर बाहर निकला और लाल पलाश के फूलों का डाल तोड़कर ले आया...
सोमरी के जुड़े में एक-एक फूल को करीने से सजाकर, उसके चेहरे को अपने दोनों हांथों में लेकर वह काफी देर तक उसे देखता रहा था.... " सोमरी, तोएं तो बहुते खपसुरत हे..." सोमरी, शर्मा कर उसके छाती में अपने चेहरे को छुपा ली थी। सरहुल के मेले में वे दोनों अपने संगी-साथी के साथ बांशुरी और मांदर के धुन पर घंटों नाची थी... अभी भी जैसे वे धुन उसके कानों में सुनाई दे रहे थे....
बुधना के पास आज काफी रुपये थे। मेले में वे दोनो खूब मजा किये थे। झूले में झुलना, फिरकी में घूमना, फिर चूड़ियों के दुकान में लाल-पीले चूड़ियों को पहनकर इतराना... अचानक बुधना उसे खींचते हुए एक सोनार के दुकान में ले गया था और सोने का एक नक् फूल अपने हांथों से उसके नाक में पहना दिया था.... और फिर निर्निमेष दृष्टि से उसे देखता रहा था....
सोमरी की ऊँगली आज खुद व खुद उस नक् फूल को छू रहा था... बुधना के स्पर्श को वह महसूस कर रही थी।
सोमरी उसे चुंटी काट कर होश में लायी- "अब चल न, लौटे के वेर हो गया..."
लौटते समय तक, बुधना-सोमरी और उनके सभी संगी-साथी हडियाँ के नशे में मतवाला हो गए थे। हर दस-बीस कदम पर बुधना उसे अपने अंकों में खिंच लेता और उसके चेहरे को देखते हुए... खिलखिलाकर हंस पड़ता था ... और चिल्लाते हुए कह रहा था..." तोएं सब जाने सुन, हमर सोमरी से खपसुरत अऊर कोई नाहीं.... हाँ की ना?" सब संगी-साथी उसके हाँ में हाँ मिलते हुए कह रहे थे... " हाँ, रे बुधना हाँ, तोर सोमरी मन से खपसुरत अऊर कोई नाहीं" कहते-कहते सब मिलकर खूब हंस रहे थे। वेचारी सोमरी लाज के मारे दुहरी हुई जा रही थी। लेकिन बुधना पर इसका कोई असर नहीं हो रहा था। जंगल के रास्ते में एक जगह बुधना रुक गया और बाकि सबको भी ठहरने के लिए कहा, और पास के फूलों से लदे एक सखुए के पेड़ पर चढ़ गया.... सखुए के फूलों की एक डाल तोड़कर नीचे उतरा और सोमरी को एक पत्थर पर बैठाकर उसके जुड़े से मुरझाये हुए पलाश के फूलों को निकालकर सखुए के ताजे फूलों को करीने से सजाने लगा.... फूलों से सजी सोमरी को देखते हुए वह फिर अपने संगी-साथी को बुलाकर कहा था.... " हमर, सोमरी से...." वाक्य पूरा होने से पहले ही सब कह रहे थे "आउर, कोई नाहीं"
बुधना अभी भी सोमरी के चेहरे को निहार ही रहा था। शाम के समय जंगल में अँधेरा कुछ जल्दी ही पसर जाता है। भालू और तेंदुए के निकलने की संभावना भी रहता है। इसलिए संगी-साथी जल्दी गावं लौटने के लिए हडबडा रहे थे। वे बुधना और सोमरी को वर्तमान में लाने के लिए चिल्लाते हुए कहने लगे- " चल रे बुधना, जल्दी-जल्दी घरे चल, फिर भर चाँद के इन्जोरा में सोमरी मन के देखत रहबे"
ऐसा ही हुआ भी था- भोर होने तक बुधना उसके सौंदर्य को निहारता ही रह गया था....
झोपडी के दरवाजे पर बच्चों की कोलाहल सुनकर वह वर्तमान में लौट आई.... बच्चे कह रहे थे- " ए नानी, जल्दी इस्कूल के मैदान में चल ना, सब तोरे ला रुकल हाउ "
" हाँ, बाबु, चल" कहते हुए उसने अपनी झोपडी के दरवाजे को भिडाकर बच्चों के साथ इस्कूल के मैदान की ओर चल पड़ी।
निदेशक महोदय उसी का प्रतीक्षा कर रहे थे। सोमरी को लेकर उन्होंने उद्घाटन के जगह पर आये। छोटी सी गड्ढे में एक नयी ईंट रखी हुई थी , निदेशक महोदय सोमरी के एक हाँथ में एक नयी ईंट और दुसरे में सीमेंट-बालू मिश्रित एक कोरनी देकर कहा- " आप इस सीमेंट -बालू के मिश्रण को इस ईंट में रखकर दुसरे ईंट को इसपर रख दीजिये"
-सोमरी कुछ देर तक ईंट और मिश्रण से भरे कोरनी को हाँथ में लेकर खड़ी रही। फिर दोनों को नीचे रख दिया।
- उसे याद आया, नक् फूल को पहनते समय बुधना उसे कहा था- " इ नक् फूल को तोयें कबहूँ नाहीं उतारबे "
- सोमरी सोच रही थी- बुधना के सपने से अधिक कीमत तो इस नक् फूल का नहीं है।
उसने अपने नाक से नकफुल को काफी प्रयास से निकाली और साड़ी से उसे अच्छी तरह पोंछकर चमकाई, चम्-चमाते नक् फूल को कुछ देर तक ध्यान से एकटक देखती रही... फिर उसे गड्ढे में रखे ईंट पर रख कर सीमेंट-बालू के मिश्रण और दूसरी ईंट को रख कर उद्घाटन प्रक्रिया को पूरा किया।
बुधना के सपने के साथ उसने इस नकफुल के जरिये खुद को को भी इस सपने का हिस्सा बना ली थी।
क्या उसकी दो बूंद आंशु भी उस नक् फूल के साथ उद्घाटन के नयी ईंट पर गिरा था....?
लेकिन हाँ.... बुधना का सपना तो पूरा हो ही गया था।
Saturday, December 4, 2010
छोटी कहानियां
अस्सी नब्बे के दसक में एक पत्रिका आती थी "सारिका" नाम की। पाक्षिक। फिर सायद मासिक और फिर गायब। इस साहित्यिक पत्रिका को जिसने भी पढ़ा है उसे इसकी कमी आज भी महसूस होता होगा। बीस वर्ष पुराने कुछ सारिका आज भी मेरे पास है। मैं आज भी दावे के साथ कहा सकता हूँ की सारिका के बाद उसके समकक्ष कोई दूसरी साहित्यिक पत्रिका फिर देखने को नहीं मिला। क्यों?
कई कारन हो सकते हैं - आम जनता को साहित्य से लगाव कम होना। पाठ्यक्रम में बदलाव होना। साहित्य के जरिये छोटी छोटी कहानियों के माध्यम से आने वाले समाज की कटु तश्विरों के सच से सामना करने का सहस काटने ही लोगो में होता है। इसलिए भी छोटी कहानियों का संसार और छोटी होता जा रहा है।
कितने कम खर्च में कितनी अछे अछे लेखकों की कहानी पढने को मिल जाया करता था। अब वोह दिन कहाँ।
ज्ञानोदय कथादेश कहानियां इत्यादि पत्रिकाएं अभी अभी भी कुछ सीमा तक ही सही छोटी कहानियों के संसार को जिन्दा रखने में सहायक हो रहा है लेकिन पाठक वर्ग की कमी के कारन या सर्कुलेसन ठीक से नहीं होने के कारन भी इन पत्रिकायों का बिक्री कम ही होता है। अक्सर मुझे इन पत्रिकायों को खरीदते समय दुकानदार अजीब निगाहों से अपनी तरफ देखते पाया है। जैसे चलो अभी अभी इसको पढने वाले लोग हैं। पूछने पर कहता है की क्या बोले साहब पञ्च पिस लाया था अभी भी आपको देने के बाद दो पिस पड़ा हुआ है। महिना तो ख़तम होने को आया। अब अगले महीने तिन पिस ही उठायूँगा।
ऐसा क्यों हो रहा है?
कई कारन हो सकते हैं - आम जनता को साहित्य से लगाव कम होना। पाठ्यक्रम में बदलाव होना। साहित्य के जरिये छोटी छोटी कहानियों के माध्यम से आने वाले समाज की कटु तश्विरों के सच से सामना करने का सहस काटने ही लोगो में होता है। इसलिए भी छोटी कहानियों का संसार और छोटी होता जा रहा है।
कितने कम खर्च में कितनी अछे अछे लेखकों की कहानी पढने को मिल जाया करता था। अब वोह दिन कहाँ।
ज्ञानोदय कथादेश कहानियां इत्यादि पत्रिकाएं अभी अभी भी कुछ सीमा तक ही सही छोटी कहानियों के संसार को जिन्दा रखने में सहायक हो रहा है लेकिन पाठक वर्ग की कमी के कारन या सर्कुलेसन ठीक से नहीं होने के कारन भी इन पत्रिकायों का बिक्री कम ही होता है। अक्सर मुझे इन पत्रिकायों को खरीदते समय दुकानदार अजीब निगाहों से अपनी तरफ देखते पाया है। जैसे चलो अभी अभी इसको पढने वाले लोग हैं। पूछने पर कहता है की क्या बोले साहब पञ्च पिस लाया था अभी भी आपको देने के बाद दो पिस पड़ा हुआ है। महिना तो ख़तम होने को आया। अब अगले महीने तिन पिस ही उठायूँगा।
ऐसा क्यों हो रहा है?
गंध
नौकरी के सिलसिले में इस शाहर में आया था। अकेले रहने के लिए एक कमरे की जरुरत थी। लेकिन कुंवारे लड़के को भाड़े पर कमरा देने के लिए कोई तैयार नहीं हो रहा था। फिर ऑफिस के ही एक सज्जन की सहायता से उनके एक परिचित के घर के बाहरी हिस्से में बने यह कमरा रहने के लिए मिल गया। इस कमरे की एक मात्र खिड़की गली की और खुलता था और गली का यह हिस्सा थोडा अँधेरा था। इस गली से आते जाते लोग उस खिड़की के निचले हिस्से के दीवाल को मूत्रालय के रूप में उपयोग किया करते थे। वेचारा सुबह-सुबह नास्ता करके आठ बजे के लगभग कमरे से निकल जाता और रात होने पर थका हरा लौटा था। अक्सर रात का खाना खाकर ही आया करता। लेकिन रात को पेशाब के दुर्गन्ध से उसे रात भर नींद नहीं हो पता था। एक दिन इस दुर्गंधित समस्या का समाधान करने के लिए वह सुबह मुह अँधेरे उठ कर दीवाल पर सफ़ेद चुने से लिख दिया" देखो, गधा पेशाब कर रहा है "। लोग गधा कहलाने के लिए तैयार थे इसलिए समस्या जहाँ का वहां ही रहा। दो-चार दिन बाद उसने वहाँ लिखा "यहाँ पेशाब करने वाले पकडे जाने पर पचास रुपये दंड देना परेगा"। ताजुब दो - चार दिन पेशाब का गंध कुछ कम था उसे अगरबत्ती जलाकर ही पूरा किया गया। नींद की गोली की आवश्यकता नहीं हुई। अगली सप्ताह आते आते गंध समस्या विकराल रूप ले चूका था। मजबूर होकर उसने मोहल्ले के नवजवानों के पास इस समस्या को रखा और यह भी कहा की यदि इसका कोई समाधान नजर नहीं आये तो कृपया कहीं एक दुसरे जगह एक कमरा दिलाने में उसकी मदद करे ताकि वह रोजी रोटी कमाने के लिए इस शाहर में रहा सके। लड़के अछे थे। उसके कमरे के निचे पेशाब करने वालों को क्यासे रोका जय? इस विषय पर उन्होंने गहरी विचार विमर्स के बाद भी कोई उपयुक्त समाधान मिल नहीं रहा था। अचानक उनमे एक ने कहा " मस्त कलंदर, समाधान मिल गया। कल सुबह देखना। वह रहस्य को लेकर कमरे की और लौट गया।
सुबह सुगन्धित अगरबत्ती के गंध से उसका नींद टुटा। खिड़की खोलते ही उसने देखा की ठीक खिड़की के पास एक बार कला पत्थर को लाल रंग से रंगकर किसीने दीवाल पर लाल रंग से ही लिख दिया था जय बजरंग बलि।
अब पेशाब के गन्ध की जगह अगरबत्ती की सुगंध था लेकिन वह अब भी पदेशन था क्योंकि अब सुगंध से उसकी नींद नहीं आती।
सुबह सुगन्धित अगरबत्ती के गंध से उसका नींद टुटा। खिड़की खोलते ही उसने देखा की ठीक खिड़की के पास एक बार कला पत्थर को लाल रंग से रंगकर किसीने दीवाल पर लाल रंग से ही लिख दिया था जय बजरंग बलि।
अब पेशाब के गन्ध की जगह अगरबत्ती की सुगंध था लेकिन वह अब भी पदेशन था क्योंकि अब सुगंध से उसकी नींद नहीं आती।
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