Saturday, December 31, 2011

कल और आगामी कल

कल जब बीत जायेगा तब हमारे लिए कुछ यादें छोड़ जायेगा। जिसमे से कुछ को हम याद रखना चाहेंगे और कुछ को भूलना। कुछ के साथ तो रहना ही परेगा। जैसे महंगाई, बे-रोजगारी, भ्रस्ताचार, घूसखोरी, बदतमीजी आदि आदि ... फिर भी २०११ के अंतिम दिन अच्छा गुजरे, येही कामना करते हुए उन महान व्यक्तियों को याद करेंगे जिन्होंने अपने गुंणों द्वारा मानवता को खुशियाँ दी। पंडित भीमसेन जोशी, एम्.ऍफ़.हुसेन, उस्ताद रहीम फहीमुद्दीन खान डागर, शम्मी कपूर, नवाब मंसूर अली खान पटौदी, स्टीव जाब्स, जगजीत सिंह, भूपेन हजारिका, हरगोबिन्द खुराना, देव आनंद, कोरिया के शशक किम जोंग इल के साथ साथ विभिन्न प्राकृतिक और अन्य कारोनों से असमय ही इस दुनिया को छोड़ कर चले गए उन्हें भी याद करेंगे। साथ ही उन हादसों को भूलना भी चाहेंगे। भ्रस्ताचार से लड़ना चाहेंगे, सुरुवात हो गयी है इस साल का सबसे अछि बात जब एक मुद्दे को लेकर पूरा देश एकमत हुआ और एक नयी सुरुवात हो गयी। दुनिया के कई अन्य देशों में भी अन्याय के खिलाफ आन्दोलन हुआ और जनता की जीत हुई। २८ साल बाद हमारा देश फिर एक बार क्रिकेट का वर्ल्ड कप जीत कर लाया। ११ मार्च जापान में सुनामी नमक हादसे के बाद सारा देश बर्बादी के कगार पर था, लेकिन जापानी एक बार फिर अपने को साबित किया और वरस बीतने नहीं पाया जापान जैसा था उससे भी ज्यादा सुन्दर हो गया, जैसे प्रकृति को मानव कहा रहा हो की चाहे तुम चाहे जितनी बार हमें गीरायो हम फिर उठ खड़े होंगे। हजारों या शायद लाखों का हत्यारा, मानवता का दुश्मन ओसामा बिन लादेन को मार डाला गया। इस वर्ष कुछ इमानदार लोगों के कारन कई भ्रष्ट्राचार उजागर हुए . भ्रष्ट्राचार के आरोप में कई शक्तिशाली नेतायों को जेल जाना पड़ा। कई मुद्दों पड जनता अपनी विरोध जताया। कई नई कानून बनाने के लिए संसद पर दवाव बनाया गया। भ्रष्ट्राचार के अंत के लिए 'लोकपाल विधेयेक पारित करने को कहा गया और वोह शायद पारित हो भी जाएगी। लेकिन ये सरकारी विधेयक होगी क्योंकि जनता के कम ही मांगो को ध्यान में रखा गया है। इस विधेयक के अधिकतर बिंदु उनके सुबिधा के लिए छोड़ दिए गए हैं। जिसमे से एक अहम् मांग थी सी बी आई को स्वंत्र संगठन बनाया जाना। जो किसी मंत्रालय के अधीन नहीं रहेगा। अन्ना जे का ये आन्दोलन सभी को याद रहेगा। जब देश के बच्चे बच्चे ने कहना सुरु किया मई भी अन्ना। बाकि फिर कभी..........

Friday, December 30, 2011

उन्हें पता नहीं की उन्हें कुछ नहीं पता

वे हमें बताते हें , की
क्या करना चाहिए,
क्योंकि
वे माननीय हैं,
भूलते हैं वे, की
हमने ही बनाया था उन्हें, 'माननीय'
वे हमें बताते हैं, की कौन सी दवा
हमारे सेहत के लिए ठीक है
और कौन सी नहीं
हमें स्वस्थ रहने के लिए
'योगा'
करना चाहिए की नहीं
किसे योग विद्या आती है, किसे नहीं,
कितने निर्लज्ज हैं वे?
जो हमारे ही द्वारा बनाये गए है, और
हमारे ही कारन ऐश की जिदगी जी रहे हैं
क्या उन्हें ये शोभा देता है?
उन्हें ये पता होना चाहिए था
की
उनकी अकर्मण्यता, काहिली
निर्ल्ज्ज़ता, chatukarita और बरबोलापन
के कारण दिनों दिन गरीबी, बेरोज़गारी, महंगाई
सुरसा की तरह बढ़ता ही जा रहा है
ऐसी किसी बात पर
वे कुछ भी नहीं बोल पते
और बोलते भी हैं
तो बकवाश करते हैं।
कभी कभी तलवे चाटने
से उन्हें फुरसत
मिल जाए, तो फिर उनसे
पूछा जायेगा की
उनकी उपलब्धि कमसे कम itni to hai
की लोग उन्हें पूजा करते है
क्योंकि उनसे उन्हें मिला है जीवन को निरोग जीने की कला
आपसे क्या सिख पाया आम जनता
अबतक आपने मानव कल्याण के लिए क्या किया?
इश्वर न करे,
आप जब दिवंगत होंगे
तो आपको याद करने वाला कितने होंगे
और
यदि उन्हें कुछ हो गया तो?
लोग उन्हें आगामी वर्षों याद रखेंगे,
इसलिए हुजुर
जरा सोचिये
और बकवाश न करके,
जिसके लिए,
आप माननीय हैं
उनके लिए ,
कुछ ऐसा कीजिये
ताकि लोग आपको भी वर्षों याद रखें!!.

Wednesday, December 21, 2011

डीसेक्सन बॉक्स

नवीं श्रेणी में पढ़ रहा था। विज्ञानं पढने की तमन्ना थी। जीव विज्ञानं के शिक्षक महोदय हम सभी को मेढक के शारीरिक अंदरूनी संरचना का प्रायोगिक पाठ पढाया और इस प्रयोग को अपने से करने के बाद उसे लिखकर लाने का गृह कार्य दिया। इस प्रयोग को करने के लिए ' डिसेक्सन बॉक्स ' (जिस बॉक्स में विभिन्न तरह के औजार रहते हैं और जिसके द्वारा छोटे-छोटे जानवरों और कीट-पतंगों की शल्यक्रिया के माध्यम से उनकी अंदरूनी शारीरिक संरचना के सम्बन्ध में जानकारी ली जाती है ) की आबश्यकता थी और मेरे पिता जी की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी की पचास-पचपन रुपये में इस बॉक्स को खरीदकर मुझ भबिश्य के वैज्ञानिक को देते। मैं इस बात को जानता था इसलिए अपने पिताजी से तो यह नहीं कहा सका पर मेरी सभी समस्यायों का हल मेरे माँ के पास हमेशा उपलब्ध रहती थी। इस समस्या को भी उनके पास रखा। उन्होंने कहा "यदि तुम्हे प्रयोग करना है, तो इसके लिए तुम्हे प्रयास करना होगा और निश्चित ही तुम्हे कोई न कोई उपाय भी मिल जायेंगे , बस प्रयास इमानदारी से करो " आगे उन्होंने यह भी कहा की उन महान बैज्ञानिको को याद करो जिन्होंने तुमसे भी अधिक आर्थिक रूप से कमजोर रहते हुए भी कई महान अविष्कार किये थे" उनके कथन से मुझे वल मिला और मैं अपने प्रयोग के लिए अबश्यक सामान जुटाने में लग गया।

घर से ही एक पुराना लकड़ी का टुकड़ा जिस पर कभी कांच का टुकड़ा लगा था और वह आइना हुआ करता था मेरे आगामी प्रयोग के लिए सब्जेक्ट को रखने का आधार बना। लोहे की पत्ती के एक छोटे टुकड़े को चिमटे का आकार दिया गया, जिससे सब्जेक्ट को पकड़ना था। अपने टिफिन के पैसे से बचाए हुए छे पैसे और माँ से मांगी गयी चार पैसे कुल दस पैसे यानी दो आने दो पैसे में बाज़ार से एक छोटी कैंची ख़रीदा गया, जिसके द्वारा सब्जेक्ट को काटना था। अब सब्जेक्ट को बेहोश करने के लिए स्प्रिट (जैसा के पुस्तक में लिखा था) की व्यवस्था करनी थी। एक मित्र के पिताजी की दावा दुकान थी जहाँ से मित्र ने एक छोटी शीशी में दुकान से अपने पिताजी की नज़र चुराकर स्प्रिट और थोड़ी सी मात्रा में रुई की व्यवस्था भी कर दिया। अब केवल एक डब्बे की जरुरत थी जिसमे सब्जेक्ट को रखकर बेहोंश करना था जो की घर पर ही आसानी से उपलब्ध हो गया और सब्जेक्ट यानी मेढक जो आँगन के आस-पास सैकड़ों की संख्या में उपलब्ध था।
रात भर ठीक से सो नहीं पाया। सुबह प्रयोग करना था। सुबह उठकर डब्बे में स्प्रिट से भीगी हुई रुई लेकर मैंने मेढकों के निवास पर गया और एक मेढक को जबरदस्ती उस स्प्रिट भीगी हुई रुई जो की डब्बे में था में जाने को विवश कर दिया। उसके अन्दर जाते ही डब्बे के ढक्कन को बंद किया और एक से सौ तक गिन लिया फिर भी निश्चिंत होने के लिए और पचास तक भी गिन लिया ताकि मेढक के बेहोश होने में कोई शक न रहे। एकसौ पचास की गिनती (जो की धीरे धीरे गिना गया था और इतने समय में शायद दो सौ भी पार हो जाता ) के बाद जब ढक्कन को खोला गया तो मैंने पाया की सब्जेक्ट पूरी तरह बेहोश हो चूका था और अब वह मेरे प्रयोग के लिए बलिदान देने को तैयार हो गया था।

अब मैं प्रयोग करने के लिए मानसिक रूप से तैयार होकर बैठ गया। क्योंकि घंटे दो घंटे में प्रयोग के निष्कर्ष को कागज़ में उतार कर स्कूल में ले जाना था, अन्यथा जगदीश सर की छड़ी..... बाप रे बाप...... याद आते ही आज भी कंपकंपी आ जाता है। मानसिक रूप से तयारी इसलिए भी करनी थी क्योंकि जीवन में पहली बार किसी जीवीत वस्तु पर छुरी यानि कैंची चलने जा रहा था। इस कार्य के लिए बारह वर्ष का उम्र उस ज़माने के लिए अत्यंत ही कम था।

बेहोंश मेढक को डब्बे से निकाल कर लकड़ी के तख्ते पर पीठ के बल लिटाया, जी हाँ पुस्तक के अनुसार, पुस्तक को खोलकर उसके प्रायोगिक पृष्ठ को सामने रख लिया था। फिर सब्जेक्ट के अत्यंत नरम चमड़े को चिमटे से पकड़कर जरा सा उठाया और कैंची को सावधानी से चमड़े के अन्दर लगते हुए धीरे-धीरे काटना शुरू किया। चमड़े को तीन तरफ से बर्फी के आकार में काट कर पुरे पेट को खोल दिया, साथ ही मेरे सामने पहली बार किसी जीवित वस्तु के अंदरूनी संरचना खुल गयी और मैं हतप्रभ होकर कुछ देर तक तो केवल देखता ही रह गया। ऊँगली के नाख़ून का एक चौथाई आकार का छोटा सा दिल और उतनी ही छोटी सी फेफड़ा। चारो और फैली असंख्य रक्त नलिकाएं आदि-आदि। मैं जल्द से जल्द पूछे गए प्रश्न के अनुसार देखे गए सभी संरचानायों को कागज़ पर उतारता गया। कुछ ही देर में मेरा प्रायोगिक कार्य का अंत हो गया। अब बारी थी सब्जेक्ट को फिर से होंश में लाने की। घर से सुई-धागे मैं लेकर ही आया था। कच्चे हनथो से मैंने फिर से सब्जेक्ट के चमड़े को सी दिया।

लेकिन प्रयोग के दौरान एक गलती हो ही गई थी जिसके लिए मैं आज तक खुद को माफ़ नहीं कर सका।

सब्जेक्ट के सामने के पैरों में से एक पैर की नाजुक सी हड्डी को हाँथ कांप जाने के कारन काट डाला था। बचपन की अबूझ बुध्धि से अपने तै उसे भी ठीक करने का प्रयास किया था, यानी हड्डी को भी धागे से सख्ती से बाँध दिया था और सब्जेक्ट के होंश में आने तक प्रतीक्षा करता रहा था। फिर उसे उसके निवास स्थान तक सावधानी से पहुंचा दिया था। उसकी स्थिति कैसी है ? इस चिंता में स्कूल का समय किसी तरह से काटा। हांलाकि जगदीश सर से काफी प्रशंशा मिला था, क्योंकि मेरा प्रायोगिक विवरण क्लाश में सबसे अच्छा हुआ था। उन्हें मेरी आर्थिक स्थिति की जानकारी थी, इसलिए उन्होंने मुझे सभी से प्रयोग करने और उसके लिए अबश्यक यंत्रो को मैंने कैसे जोगद लगाया था उसका विवरण देने को भी कहा था। सभी मित्रों के लिए मैं एक उदाहरन बन गया था। फिर भी मुझे ख़ुशी से अधिक चिंता सता रही थी की मेरे सब्जेक्ट की स्थिति न जाने कैसी है। क्या वोह फिर से चल रहा होगा? आसानी से कूद प् रहा होगा?
स्कूल से लौट कर मेढकों के रहने की जगह पर गया, जहाँ सब्जेक्ट को मैंने छोड़ा था। उसकी स्तिथि देख कर मुझे रोना आ गया। वह घिसट रहा था। उसके सामने का एक पैर अब किसी काम का नहीं रहा था। वह जिन्दा था और बाकि तीन पैरों पर चलने की कोशिश कर रहा था। यानि घिसट रहा था। मैं अन्दर ही अन्दर कांप सा गया और उसको जिन्दा रखने के लिए क्या कर सकता हूँ सोंचने लगा। कुछ छोटे-छोटे कीड़ों को पकड़कर उसके सामने रखा। भूखा तो वोह था ही एक जगह पड़े पड़े कितना शिकार कर पाता? जल्द ही उसने उन कीड़ों का भोजन करने के बाद अपने गोल-गोल आँखों से देखा जैसे कह रहा हो की तुमने मुझ पर कोई उपकार नहीं किया ये तो तुम्हारा कर्त्यब्य था। अब उसे सहारा देकर वहां से उठाया और छाहँ में रख दिया। ऐसा लगा जैसे उस जीव को अपने प्रयोग के स्वार्थ के लिए उपयोग करके बहुत बड़ा अन्याय किया था। अब उसे थोड़ी सी आराम देकर कुछ शांति मिला। तै कर लिया की अब उसके भोजन की व्यवस्था मैं ही करूँगा। दो-चार दिन उसे उसी जगह पर ईमानदारी से भोजन देता रहा था लेकिन एक दिन उसे वहां पर नहीं पाया। धीरे-धीरे मैं उसे भूलने लगा था। लेकिन एक दिन खेलते हुए उसी जगह पर पहुँच गया जहाँ से मैंने उसे प्रयोग करने के लिए पकड़ा था। देखा ! कि चाहरदीवारी के नीचे एक बिल के बाहर वह पड़ा हुआ था और एक दूसरा मेढक छोटे-छोटे कीड़ों को पकड़कर उस तक पहुंचा रहा था। मैं देखता ही रह गया।

Sunday, September 11, 2011

चर्चा ज्वलंत मुद्दों पर

इन दिनों 'भ्रष्टाचार' और उसके सहोदर 'राईट टु रिकॉल और राईट टु रिजेक्ट' मुद्दों पर देश भर में आम आदमी से लेकर तथाकथित ख़ास व्यक्तित्यों में चर्चाएँ छिड़ी हुई हैं। ऐसा लगता ही नहीं वल्कि विश्वाश होने लगा है की देश के सभी लोग उपरोक्त मुद्दों पर कानून बनाने के लिए संसद को वाध्य करके ही दम लेंगे। मेरे मन में सवाल ये आ रहा है की 'भ्रष्टाचार' की परिभाषा क्या है ? यदि इस शब्द को परिभाषित किया जाये तो .....

" बंगला भाषा में एक कहावत है 'ठग बाछते गावं उजाड़' यानि जब आप गावं में ठग चुनने निकलेंगे तो शायद ये पाया जय की गवां के सभी लोग ठग हैं।

'भ्रष्टाचार की पारिभाषिक अर्थ के अनुसार 'सौ में निन्यानाब्बे बेईमान फिर भी भारत महान'। आज जिन्हें हम भ्रष्टाचारी कह रहे हैं, उन्हें हमने ही चुन कर संसद में भेजा था। ये अलग बात है की उन्हें चुनने के पीछे हमारी मंशा कुछ और थी और उनकी मंशा कुछ और....

कल एक अति वृद्ध शिक्षक महोदय से बातें हो रही थी, उनका कहना था की 'ये घूसखोरी या भ्रष्टाचार कोई नयी तो है नहीं, मैं १९५२ में जब एक मिडिल स्कूल का हेडमास्टर था उस समय भी हम शिक्षकों को समय पर वेतन पाने के लिए प्रति माह २५ रुपये देने पड़ते थे।

चलिए फिर से आते हैं उसी विषय पर की यह कानून लागू करेगा कौन ? जाहिर सी बात है, की यह कानून जिनके या जिन लोगों पर लागू होने की संभावना अधिक है, वे ही इस कानून को बनायेंगे भी, फलस्वरूप वे पुरजोर कोशिश करेंगे की यह कानून लागू नहीं हो या हो भी तो इसमें इतनी पेंच हो की उन पर कोई आंच नहीं आ पाए।

Saturday, July 23, 2011

जिम्मेदारी

हमारे भबिश्य के संभावित प्रधानमंत्री राहुल गाँधी जी का एक वक्तब्य एक घंटे पहले नेट पर पढ़ा । वे उत्त्तर प्रदेश की दुखद स्तिथि के लिए राज्य सर्कार को जिम्मेदार ठहराते हुए युवाओं का आह्वान किये हैं। अन्यथा भगवन ही मालिक ......

अब सवाल ये है की उनके नज़र में क्या केवल उत्तर प्रदेश के युवाओं को ही जागना चाहिए । राहुल जी कब तक दूसरों पद जिम्मदारी थोपते रहिएगा, आप और आपके कुनबे जो हर जगह जाकर केवल दूसरों को जिम्मेदार ठहराते फीड रहे हैं। क्या आप खुद जिम्मेदार कहलाने लायक हैं? हमारे देश का यह दुर्भाग्य है की इस देश की प्रधानमंत्री तक जिन जिम्मेवारिओं को खुद पूरा नहीं कर सके उसके के लिए दूसरों को जिम्मेदार ठहड़ाते रह गए। अगर जिम्मेवारी ही ईमानदारी से निभाया जाता तो क्या देश के खजाने से करोड़ों रुपये, इस देश के मेहनतकश जनता की मेहनत की कमाई को लूट कर कोई विदेशों में जमा नहीं kआर पता। जिस धन से करोंरों का पेट भर सकता था, क्या आप और हम सभी इस लूट के जिम्मेवार नहीं हैं? हाँ हम भी इन भ्रस्ट्राचार, बेईमानी, शैतानी, क्रूरता के लिए सामान रूप से जिम्मेवार हैं।

कब तक?

और कब तक, आप, आपस में लड़ते रहेंगे ?
एक दुसरे को कष्ट देते रहेंगे ?
अपने ही भाई बहनों, मातायों, बेटे-बेटियों की
हत्या करते रहेंगे?
क्या येहि सिखाया था?
पैगम्बरों ने?
कहीं ऐसा तो नहीं?
की, उनके उपदेशों को नहीं मानने के कारण,
उन्हीके उपदेशों को तोड़-मडोर कर
गलत अर्थ निकल कर
उपदेशों को अभिशाप बना लियें
और आपस में ही लड़कर कर मर रहे हैं,
आखिर कब तक?

Sunday, April 10, 2011

जन लोकपाल विधेयक

१९४७ से अबतक देश में भ्रष्टाचार के इतने मामले जनता के सामने आये हैं की जैसे ही अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के अंत के लिए अनशन का एलान किया सारा देश उनके समर्थन में आगे आ गया। इससे येही प्रतीत होता है की देश की जनता भ्रष्टाचार से कितना अधिक त्रस्त हो गया है। एक उदाहरण है बोफोर्ष घोटाला, २३ वर्ष बीत जाने के बाद भी आज तक उस पर जांच ही चल रहा है। पर आम जनता को लोकपाल विधेयक के उद्देश्य के समबन्ध में अधिक जानकारी नहीं है।
प्रसिध्ध राजनीतिक चिन्तक श्री वेद प्रताप वैदिक जी के विचारों का संक्षेप इस तरह है:-
लोकपाल का अर्थ है, ऐसे पद की स्थापना जो राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सर्बोच्च न्यायाधीश से लेकर छोटे से छोटे सरकारी कर्मचारी के भ्रष्टाचार को पकडे और सजा दिलवाए। इस विधेयक को संसद में पास करने में ४२ साल बीत गए । लेकिन इस पर क्या विवाद हो सकता है की लोकपाल कानून शीघ्रातिशीघ्र बनना चाहिए और उस पर अविलम्ब अमल होना चाहिए। लगभग हर देश यह मानता है की जहाँ शक्ति होगी, वहीँ भ्रष्टाचार होगा। राज्य का काम निगरानी रखना है लेकिन राज्य पर निगरानी रखना भी तो किसी का काम होना चाहिए।
आन्दोलनकारियों का विधेयक निश्चय ही बेहतर है। सरकारी विधेयक मूलतः सरकारी विधिबेत्तयों और अफसरों ने तैयार किया है, जबकि जनलोकपाल विधेयक की तयारी में देश के जाने-माने विधिवेत्तयों, समाजसेवियों, जन्नेतायों, सेवानिवृत अफसरों और न्यायाधीशों ने दिमाग खपाया है। यदि सरकारी भ्रष्टाचार को ख़त्म करने का विधेयक खुद सरकार बनेगा तो वह खुद पर कितनी सख्ती करेगी? अपनी खाल बचने के लिए वह हजार रास्ते निकल लेगी। सरकारी विधेयक में प्रधानमंत्री के प्रतिरक्षा और विदेशी मामलों सम्बन्धी कामों को नहीं छुवा जा सकता है। सांसदों के विरुद्ध यदि भ्रष्टाचार के आरोप लगे तो उनकी जाँच लोकसभा अध्यक्ष की अनुमति के बिना नहीं हो सकती। किसी मंत्री या सत्तारूढ़ दल के सांसद के विरुद्ध क्या किसी अध्यक्ष की अनुमति प्राप्त करना संभव है? इस वैकल्पिक विधेयक में सी बी आई और निगरानी आयोग को लोकपाल के मातहत रखा गया है और लोकपाल को शक्तिसंपन्न बनाया गया है। निश्चित समय में भ्रष्टाचार की जांच करना और दोषियों को दण्डित करना इस जनलोकपाल का काम होगा। इस काम के लिए उसे और उसके सहयोगियों को किसी की अनुमति की जरुरत नहीं होगी। वह पूर्ण स्वायत्त होगा। लोकपाल की नियुक्ति में प्रधानमंत्री, गृहमंत्री तथा विपक्षी नेतायों का कोई हाथ नहीं होगा। यह लोकपाल अपने जाल में नेतायों के साथ-साथ अफसरों और जजों को भी समेट सकेगा।
सरकार का कहना है यह परंपरा संसदीय प्रभुता का उल्लंघन करेगी।
बहरहाल, अनशन अपने आपमें इसलिए स्वागतयोग्य है की इससे देश में भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनजागरण की आंधी उमर सकती है।
इस आन्दोलन का परिणाम क्या हुआ, kya

Wednesday, February 9, 2011

क्या करें?

यह गावं और आस-पास का ईलाका नक्शल प्रभावित थाकुछ ही दिन पहले प्रखंड कार्यालय और पंचायत भवन को नक्शालियों द्वारा ध्वस्त किया जा चूका थाएक मात्र प्राथमिक विद्यालय में पुलिस के जवान नक्शालियों को पकड़ने के लिए रुके हुए थेअचानक रात को नक्शालियों ने पुलिस के जवानों पर आक्रमण कर दियावे संख्या में कम थे और नक्सालियों की संख्या ज्यादा थीफलस्वरूप पुलिस को भागना पड़ादुसरे दिन मुख्यालय से अधिक संख्या में पुलिस के जवान उस गावं में गए और गावं के औरत-मर्द, बच्चे-बूढ़े, जवान सभी को बेतहाशा पीटने लगेउनकी गलती यह था की वे नक्शालियों के आक्रमण के समय पुलिस की मदद के लिए क्यों नहीं आये थेअर्थात गावं के लोग नक्शल समर्थक थे येही मान लिया गया और उनमे से बीस-पच्चिश को पकड़कर थाने लाया गयाउनमे से कुछ तो गाय-बकरी बेच कर या जो भी वे बेच सकते थे को बेच कर रुपये जुटाए और थाने में चढ़ावा देकर छुट गएबाकि बचे लोग नक्शाली कहलाये और आज भी वे बिना किसी कारन के जेल में हैं और जाने कब तक रहेंगे क्योंकि उनके पास बेचने के लिए कुछ भी नहीं था
उनकी स्तिथि ऐसी है की यदि वे नक्शालियों का साथ देते हैं तो पुलिस उन्हें मारती-पिटती है और नक्शाली समर्थक कहकर जेल में डाल देती है। यदि वे पुलिस का साथ देती है तो नक्शाली उन्हें पुलिस का खबरी कहकर मार डालती है। अब ये साधन विहीन गावं वासी क्या करें? है आपके पास कोई जवाब ?

Saturday, January 15, 2011

महंगाई के कारण

महान देश के,
महान राजनेता,
महिमामयी वाक्यों से,
देश के विकास की,
गौरव गाथा का बयान कर रहे थे॥
गरीबी रेखा से नीचे की,
जनताओं की
क्रय शक्ति बढ़ने के कारण
महंगायी बढ़ी है, ऐसा ही बता रहे थे...
फिर भी मिडिया वाले,
पता नहीं कहाँ-कहाँ से,
भूख से मरनेवालों की खबरें,
तस्बीरों के साथ,
छाप रहे थे...
यह बिपक्ष का चाल है,
यह भी बता रहे थे...

Sunday, January 9, 2011

यह सच है

बचपन से जवानी तक एक साथ खेल कर हम सब बड़े हुए थे। बंगाली, पंजाबी, बिहारी (यानि जिनकी मातृभाषा हिंदी है ), मुस्लमान, क्रिस्चन, ब्रह्मण, चमार, कायस्थ , नामधारी और शिख गरीब और अमीर मेरा ये शहर एक छोटा सा क़स्बा नुमा शहर था जो एक छोटी सी पहाड़ी नदी के किनारे बसा हुआ है।
जंहाँ तक याद है...
ऐसा कभी महसूस ही नहीं हुआ की हम में से कोई एक दुसरे से अलग है। एक साथ खेलते-कूदते कभी भी किसी ने एक दुसरे पर उसके धर्म, भाषा, जाती या अमीरी को लेन का साहस नहीं किया। क्योंकि वह जनता था की इनमे से किसी का भी भाषा में उपयोग करने पर उसे उसी समय सर्वसम्मति से बहिस्कृत कर दिया जायेगा।
एक ही साथ हमलोग हर धर्मं के मौज,ख़ुशी, धूम धडाका वाली पर्वों को मनाया करते थे...
दुर्गापूजा, दिवाली, होली, के साथ-साथ ईद, बकरीद, क्रिस्मास, और गुरुपर्व। हर जगह हम, सभी एक साथ दीख जाते थे।
घुटू,बुबुन, पप्पू, तबरेज, जोगिन्दर, झुनुवा जैसे ही और कितने-कितने। अब सबका नाम लिखने लगूं तो सारी रात भी कम पड़ेगी।
प्रयात प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी के असमय, क्रूर हत्या के बाद देश में जो कुछ हुआ था उसकी पुनराब्रित्ति करने से कोई फायदा तो नहीं लेकिन उन्ही के शासन काल में देश में आपातकाल जारी हुआ था। मैं आपातकाल की अच्छाइयों या बुराइयों के सम्बन्ध में चर्चा नहीं करने जा रहा हूँ। लेकिन उस समय सरकारी कार्यालयों की काम-काज की स्तिथि के बारे में बताना आबश्यक समझ रहा हूँ । हमारे जिले के कचहरी में स्थित जितने भी अलग-अलग विभागों के कार्यालय थे उनमे उस समय कर्मचारियों की हाजरी शत-प्रतिशत होती थी और सुबह नौ बजे आफिश आने की जगह आठ बजे ही लोग पहुँच जाते और पांच बजे लौटने की जगह सात बजे घर लौटते इसके बाद भी चिंतित रहते थे की कब कार्यालय से बुलावा आ जाये।
कितनी अनुशाषित हो गए थे हम, अधिकतर कार्यालय के घुसखोर कर्मचारियों को घुष लगभग नहीं के बराबर मिलते थे। हर काम स्मूथली चल रहा था।
एक वाकया और सुनाता हूँ...
दो साल पहले तक, मेरे शहर में बाईक चलने वाले कोई भी हेलमेट नहीं पहना करता था। मेरे एक मित्र हैं परिवहन विभाग के उच्च अधिकारी। उस समय एक दिन उनके घर पर हम कुछ मित्र बैठकर बातें कर रहे थे। शहर के परिवहन व्यवस्था पर बात चल पड़ी। मैंने कहा, की "सभी को हेलमेट पहनकर बाईक चलाना जरुरी कर देना चाहिए लेकिन यह नियम यहाँ नहीं चलने वाला..." मित्र के सम्मान में शायद चोट लगा " देखो, अगले पंद्रह दिनों में सबके माथे पर हेलमेट नहीं पहना दिया तो नौकरी छोड़ दूंगा"
दुसरे ही दिन से हर चौराहे पर बिना हेलमेट वालों पर परिवहन विभाग के नियमानुसार सौ रुपये दंड लगाया जाने लगा फलस्वरूप आज की तारीख तक सहर के लगभग नब्बे प्रतिशत बाईक चलनेवाले हेलमेट पहनकर ही बाईक चलते हैं।
ऊपर के दोनों वाकये से क्या प्रमाणित होता है?
डंडा...कानून के डंडा का अगर सही तरीके से उपयोग किया जाये तो अपने-आप सभी सही रस्ते पर आ जाते हैं।
ऐसा क्यों?
दो-चार माह पहले की बात है, हमारे अपार्टमेन्ट से साटें हुए एक और अपार्टमेन्ट बन रहा है। उसके बिल्डिंग मटेरियल रोड पर ही पड़े रहते थे। स्कूटर, साईकिल, रिक्शा के साथ-साथ पैदल चलना भी मुस्किल होने लगा था। मैंने बिल्डिंग के मुन्सी को बुलाकर कहा की " भैया, ये सब छार्री, बालू रोड से हटवाकर थोडा अन्दर करवा दीजिये, लोगों को आने जाने में असुबिधा हो रहा है" उसने वादा किया की शाम तक ये सब हटा देगा। अगले दो-तिन दिनों तक उसने अपने वादे पे अमल नहीं किया।
फिर तिन दिन बाद दुबारा गया और कहा " सुनो, बाबु, भैया कहकर प्यार से कहा था की ये सब हटवा लो, आने-जाने में दिक्कत होता है, तुम सुने नहीं, अब अगले दो घंटे में अगर इसे हटा नहीं लोगे तो तीसरे घंटे में मैं आयूंगा और तुम्हारा हाँथ-पावं तोड़ दूंगा। देखते हैं तुम्हारा मालिक क्या करता है"?
और आप बिश्वास करेंगे?
दो घंटा तो क्या डेढ़ घंटे में ही रोड खाली हो गया था।
ऐसा क्यों होता है की मीठे बोल सुनकर लोग आपको कमजोर, निरीह, भद्र , समझते हैं और आपका कोई काम सहज में ही नहीं करते और उसी बोल को करवे शब्द में बोलने पर आपका काम आसानी से हो जाता है।
ये मेरा व्यक्तिगत अनुभव है, औरों की तो कह नहीं सकता।
नौकरी के सिलसिले में मैं इस शहर को कई साल पहले छोड़कर चला आया था। कई साल बाद इस शहर के लिए एक दौरा कार्यक्रम बना

मैं शुरुवात में जो कह रहा था उससे भटक गया था। अब फिर मुद्दे पे आता हूँ...





जारी रहेगा ....

Thursday, January 6, 2011

संवेदना

"नमस्ते दीदी, कैसी हैं आप?"
"ठीक ही हूँ", - अचानक जोर से चिल्लाते हुए-" अरे बहु, क्या उह-आह लगा रखी है, जल्दी करो, कपडे धोकर बर्तन भी मांजने हैं, बहाना करने से नहीं चलेगा, एक तुम्ही बच्चा पैदा नहीं कर रही हो, हम भी किये हैं और सारे घर का काम करते हुए.... क्यों दीदी सच कह रहीं हूँ ?"
- बहु दर्द से छटपटाते हुए भी कपडे धोती रही
- अन्दर के कमरे से एक और आवाज रही है-" ऊह..माँ..." "एक मिनट दीदी अभी आती हूँ" "...हाँ बेटी बहुत दर्द हो रहा है?" अब एक शरीर से दूसरा शरीर निकलना...दर्द तो होगा ही..तुम सोयी रहो, लाओ मैं पांव दबा दूँ, कुछ खाओगी?...मंगा दूँ ?
" नहीं मुझे कुछ भी खाने का मन नहीं कर रहा है"
" ना बेटी, ऐसा कहने से कैसे चलेगा, तू खाएगी तभी तो बच्चा स्वस्थ होगा?
"मम्मी जी, बहुत भूख लगी है, कुछ खा लूँ ?, फिर बर्तन मांज लुंगी" बहु कह रही है।
"हाँ-हाँ, देख रसोई में रोटी रखी है, गुर के साथ खा ले, देखना, पनीर रखा है, उसे छूना मत, वो मेरी बेटी के लिए है"