सभी धर्म हमें आदमी यानि मनुष्य बनना सिखाता है। पर आदमी कभी धार्मिक नहीं हो पाया। धर्म के नाम पर हमने सिखा केवल ढोंग और अन्धाबिश्वाश। जिसके पीछे कोई सर्वमान्य तर्क हमे अब तक नहीं मिला।
धर्म के नाम पर हम खुद ही अपने आप को बांटकर,एक दुसरे को श्रेष्ठ कहलाने के लिए ,आपस ही में लड़ते हुए, एक दुसरे की अबिराम हत्या करते हुए अपने वजूद को ही ख़त्म कर रहे है ? ऐसा क्यों?
क्यों धर्म के नाम पर अन्धाबिश्वाश को एक ऐसा हथियार बनाया जिससे किसी भी असहाय, गरीब, मुर्ख मनुष्य समुदाय को शक्तिशाली, धनि मनुष्य समुदाय जब चाहे अपने हित साधने के लिए उस अन्धविश्वाश का उपयोग कर सके।
हमारे राज्य की राजधानी से केवल ३० - ४० की० मि० दूर आज भी किसी असहाय गरीब परिवार की थोड़ी सी जमीं को अपने कब्जे में करने के लिए उस परिवार के किसी को भी डायन बता कर पुरे परिवार की आहुति ली जाती है.
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