हजारों साल बीत गए पर आदमी अब तक आदमी नहीं बन पाया। जाति, धर्म और संप्रदाय में ही बंट कर रह गया। खुद को औरों से अलग और बिशिष्ट दिखने के लिये आदमी खुद को ऊँची और नीची जाति में बाँट लिया। जबकि हर कोई जानता है की उसके पास जैसे दो हाथ दो पैर दो आँखे है वैसे ही औरों के पास भी हैं। ये सच है की किसीके पास प्राकृतिक रूप से बुद्धि ज्यादा होने के कारन वह अपनी बुद्धि और कौशल से औरो से अधिक धन और शिक्षा प्राप्त कर लेता है फिर प्रारंभ होता है उस बुद्धि और कौशल का दुरुपयोग। आदमी उसी बुद्धि और कौशल से अधिक से अधिक धन और शक्ति कमाता है। फिर उसीसे औरों को यह मानने पर बाध्य करता है के वह श्रेष्ट है तथादुसरे निकृष्ट। श्रेष्टता के निदर्शन के लिये वह अपने आप को धर्म, जाति और सम्प्रदाय में बांटता जाता है। इसी श्रेष्टता को प्रमाणित करने के लिये वह औरों का शोषण करता है और तकत्बर बनता जाता है। यही ताकत उसे अहंकारी बनाता है। अहंकार उसे शोषक और आत्याचारी बनाता है।
एक प्रश्न अक्सर मेरे मन में आता है- प्रागैतिहासिक काल में जब आदमी जंगलों और गुफयों में रहता था और रात के अँधेरे में जंगल के दुसरे जानवरों से डरते हुए रात गुजारा करता था, बरसात में बिजली के करक में थर थर कांप रहा था उस समय वह किस भगवन को याद करता था ? उस समय कहाँ थे भगवान्, अल्लाह, जेसस और तथाकथित सर्वशक्तिमान ईश्वर ? सुबह जब सूर्योदय हुआ तो खुद व खुद उसका डर का अंत हो गया। स्वाभाविक है के वह सबसे पहले सूर्य का आराधना ही किया होगा क्योंकि उस शक्तिपुंज के कारन उसे हिम्मत मिला। जहाँ से उसे पेट की भूख मिटाने के लिये भोजन प्राप्त हुआ या जिस पर वह अपनी शारीरिक शक्ति से विही प्राप्त नहीं कर पा सकता हो , उसे ही वह ईश्वर , भगवान्, जेसस आदि मानने लगा होगा। जैसे नदियाँ, पेड़-पौधें, पहाड़ -पर्वत,रामकृष्ण परमहंश द्वारा कहा गया एक बाक्य याद आ रह है- " सबार उपरे मानुष सत्य ताहार उपरे नाई ." अगर आदमी ही नहीं होता तो ईश्वर , अल्लाह, जेसस को कौन जानता ? आदमी की कल्पना ही तो ईश्वर, अल्लाह और जेसस को बनाया। है न ?
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