Sunday, September 26, 2010

सुख-dukh

मेरे पिताजी कहते थे की आदमी जो भी सुख और आनंद का उपभोग करता है वे सभी ईश्वर द्वारा रचे हुए है और आदमी जो भी दुःख और परेशानियों को भोगता है वे सभी उसके खुद के बनाये हुए है। यानी आदमी के अंदर जो कुछ अच्छा है वही ईश्वर है और इसीलिए इन अच्छी चींजों के बदौलत वह सुख और खुशियों को पाता है। उसकी श्रेष्टता और धन की शक्ति उसे अहंकारी बनाता है जो उसे जागतिक बस्तुयों का सुख तो देता है लेकिन अध्यात्मिक सुख उसे कभी नहीं मिल पाता। वह केवल धन और बिभिन्न उपभोक्ता सामग्रियों को पाने के लिए दौड़ता रहता है। उसे कभी चैन नहीं मिल पाता। उसका श्रेष्टता का अहंकार उसके जीवन में दुःख और परेशानियों को भर देता है।

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