कार्यालय की छुट्टी हुई थी। हम सभी घर की ओर लौट रहे थे। पास के दुसरे कार्यालय की गाड़िया तेज गति से जा रही थी। एक चिनिया बादाम वाला अपने खोमचे को शर पर रख कर सड़क के किनारे से अपने घर की ओर लौट रहा था। अचानक एक तेज गति से आनेवाली गाड़ी उस खोमचेवाले को टक्कर मार कर निकल गया। खोमचेवाले का सारा बादाम सड़क पर तितर-बितर हो चूका था। बादामों को पिसते हुए गाड़ियाँ दौर रही थी. उसे भी चोट लगी थी। वह दर्द से छटपटाते हुए अपने कमर पर हाथ रखकर तेज गति से आनेवाली गाड़ियों को रोकने की कोशिश करते हुए चिल्ला रहा था " ए भैया, ए बाबु, ए मालिक जरा सा रुक जा भैया, हाय रे हमार बादाम, अब हम का बेचब , बचोवन का रोटी कहा से लाब" तब तक सारे बादाम नष्ट हो चुके थे और उसका खोमचा जो साधारण लकड़ी के बने थे वह भी टूट चूका था। उसकी सारी पूंजी नष्ट हो गयी थी। लेकिन फिर भी कोई गाड़ी वाला नहीं रुका।
ये अलग बात है की हम कुछ लोग आपस में चंदा करके थोड़ी सी रुपये जमा करके उस के हाथ में दिए ये सोच कर की शायद इससे उसकी कुछ मदद हो जाये?
क्या हमारी संबेदना में कमी आ गयी है?
अच्छी पोस्ट है...
ReplyDeleteaapko meri post pasand aaya. iske liye dhanyabad. anya poston ko bhi kripaya parhkar apna bahumulya wichar de taki mujhe likhne me utsah mil sake.
ReplyDelete