Sunday, October 3, 2010

जब कोई परिवार अपने सुयोग्य पुत्र के लिए जीवनसंगिनी की खोज करते हुए धन की भी खोज जारी रखता है ताकि उस सुयोग्य पुत्र को अधिक से अधिक दाम में बेचा जा सके तब उस परिवार के शिक्षित होने पर संदेह होता है अ संदेह इस बात का भी होता है की उस परिवार के माता-पिता को अपने सुयोग्य पुत्र की योग्यता पर भी संदेह है की वह स्वाबलंबी होकर भी इतना अयोग्य है की वह अपनी पत्नी के लिए जरुरत की बस्तुएं ला नहीं सकता। उसे खुद को बेचकर भी धन चाहिए ताकि आगामी भबिश्य में वह अपनी पत्नी को भोजन, कपरे, कार और घर की ब्यबस्था कर सके। यदि हमलोग अपने बच्चो को शिक्षित बनाकर भी अप्रत्यक्ष रूप से भिखारी बनाना चाहते है? उसके योग्यता पर प्रश्नचिंह लगाना चाहते हैं, तो फिर इस दहेज़ रूपी अभिशाप से हमें कभी भी मुक्ति नहीं मिल सकता। भले ही हमलोग इसके लिए कोई भी तर्क प्रस्तुत करते जाये, सच यही है हम जन बुझ कर एक शिक्षित समाज में शिक्षित और स्वाबलंबी पुत्र और पुत्रियों को हाथ पसारना ही सीखा रहे हैं। काश आज के जवान लको को अगर इतना आत्मसम्मान होता तो शायद दहेज़ का भी अंत हो जाता।

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