Wednesday, December 21, 2011

डीसेक्सन बॉक्स

नवीं श्रेणी में पढ़ रहा था। विज्ञानं पढने की तमन्ना थी। जीव विज्ञानं के शिक्षक महोदय हम सभी को मेढक के शारीरिक अंदरूनी संरचना का प्रायोगिक पाठ पढाया और इस प्रयोग को अपने से करने के बाद उसे लिखकर लाने का गृह कार्य दिया। इस प्रयोग को करने के लिए ' डिसेक्सन बॉक्स ' (जिस बॉक्स में विभिन्न तरह के औजार रहते हैं और जिसके द्वारा छोटे-छोटे जानवरों और कीट-पतंगों की शल्यक्रिया के माध्यम से उनकी अंदरूनी शारीरिक संरचना के सम्बन्ध में जानकारी ली जाती है ) की आबश्यकता थी और मेरे पिता जी की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी की पचास-पचपन रुपये में इस बॉक्स को खरीदकर मुझ भबिश्य के वैज्ञानिक को देते। मैं इस बात को जानता था इसलिए अपने पिताजी से तो यह नहीं कहा सका पर मेरी सभी समस्यायों का हल मेरे माँ के पास हमेशा उपलब्ध रहती थी। इस समस्या को भी उनके पास रखा। उन्होंने कहा "यदि तुम्हे प्रयोग करना है, तो इसके लिए तुम्हे प्रयास करना होगा और निश्चित ही तुम्हे कोई न कोई उपाय भी मिल जायेंगे , बस प्रयास इमानदारी से करो " आगे उन्होंने यह भी कहा की उन महान बैज्ञानिको को याद करो जिन्होंने तुमसे भी अधिक आर्थिक रूप से कमजोर रहते हुए भी कई महान अविष्कार किये थे" उनके कथन से मुझे वल मिला और मैं अपने प्रयोग के लिए अबश्यक सामान जुटाने में लग गया।

घर से ही एक पुराना लकड़ी का टुकड़ा जिस पर कभी कांच का टुकड़ा लगा था और वह आइना हुआ करता था मेरे आगामी प्रयोग के लिए सब्जेक्ट को रखने का आधार बना। लोहे की पत्ती के एक छोटे टुकड़े को चिमटे का आकार दिया गया, जिससे सब्जेक्ट को पकड़ना था। अपने टिफिन के पैसे से बचाए हुए छे पैसे और माँ से मांगी गयी चार पैसे कुल दस पैसे यानी दो आने दो पैसे में बाज़ार से एक छोटी कैंची ख़रीदा गया, जिसके द्वारा सब्जेक्ट को काटना था। अब सब्जेक्ट को बेहोश करने के लिए स्प्रिट (जैसा के पुस्तक में लिखा था) की व्यवस्था करनी थी। एक मित्र के पिताजी की दावा दुकान थी जहाँ से मित्र ने एक छोटी शीशी में दुकान से अपने पिताजी की नज़र चुराकर स्प्रिट और थोड़ी सी मात्रा में रुई की व्यवस्था भी कर दिया। अब केवल एक डब्बे की जरुरत थी जिसमे सब्जेक्ट को रखकर बेहोंश करना था जो की घर पर ही आसानी से उपलब्ध हो गया और सब्जेक्ट यानी मेढक जो आँगन के आस-पास सैकड़ों की संख्या में उपलब्ध था।
रात भर ठीक से सो नहीं पाया। सुबह प्रयोग करना था। सुबह उठकर डब्बे में स्प्रिट से भीगी हुई रुई लेकर मैंने मेढकों के निवास पर गया और एक मेढक को जबरदस्ती उस स्प्रिट भीगी हुई रुई जो की डब्बे में था में जाने को विवश कर दिया। उसके अन्दर जाते ही डब्बे के ढक्कन को बंद किया और एक से सौ तक गिन लिया फिर भी निश्चिंत होने के लिए और पचास तक भी गिन लिया ताकि मेढक के बेहोश होने में कोई शक न रहे। एकसौ पचास की गिनती (जो की धीरे धीरे गिना गया था और इतने समय में शायद दो सौ भी पार हो जाता ) के बाद जब ढक्कन को खोला गया तो मैंने पाया की सब्जेक्ट पूरी तरह बेहोश हो चूका था और अब वह मेरे प्रयोग के लिए बलिदान देने को तैयार हो गया था।

अब मैं प्रयोग करने के लिए मानसिक रूप से तैयार होकर बैठ गया। क्योंकि घंटे दो घंटे में प्रयोग के निष्कर्ष को कागज़ में उतार कर स्कूल में ले जाना था, अन्यथा जगदीश सर की छड़ी..... बाप रे बाप...... याद आते ही आज भी कंपकंपी आ जाता है। मानसिक रूप से तयारी इसलिए भी करनी थी क्योंकि जीवन में पहली बार किसी जीवीत वस्तु पर छुरी यानि कैंची चलने जा रहा था। इस कार्य के लिए बारह वर्ष का उम्र उस ज़माने के लिए अत्यंत ही कम था।

बेहोंश मेढक को डब्बे से निकाल कर लकड़ी के तख्ते पर पीठ के बल लिटाया, जी हाँ पुस्तक के अनुसार, पुस्तक को खोलकर उसके प्रायोगिक पृष्ठ को सामने रख लिया था। फिर सब्जेक्ट के अत्यंत नरम चमड़े को चिमटे से पकड़कर जरा सा उठाया और कैंची को सावधानी से चमड़े के अन्दर लगते हुए धीरे-धीरे काटना शुरू किया। चमड़े को तीन तरफ से बर्फी के आकार में काट कर पुरे पेट को खोल दिया, साथ ही मेरे सामने पहली बार किसी जीवित वस्तु के अंदरूनी संरचना खुल गयी और मैं हतप्रभ होकर कुछ देर तक तो केवल देखता ही रह गया। ऊँगली के नाख़ून का एक चौथाई आकार का छोटा सा दिल और उतनी ही छोटी सी फेफड़ा। चारो और फैली असंख्य रक्त नलिकाएं आदि-आदि। मैं जल्द से जल्द पूछे गए प्रश्न के अनुसार देखे गए सभी संरचानायों को कागज़ पर उतारता गया। कुछ ही देर में मेरा प्रायोगिक कार्य का अंत हो गया। अब बारी थी सब्जेक्ट को फिर से होंश में लाने की। घर से सुई-धागे मैं लेकर ही आया था। कच्चे हनथो से मैंने फिर से सब्जेक्ट के चमड़े को सी दिया।

लेकिन प्रयोग के दौरान एक गलती हो ही गई थी जिसके लिए मैं आज तक खुद को माफ़ नहीं कर सका।

सब्जेक्ट के सामने के पैरों में से एक पैर की नाजुक सी हड्डी को हाँथ कांप जाने के कारन काट डाला था। बचपन की अबूझ बुध्धि से अपने तै उसे भी ठीक करने का प्रयास किया था, यानी हड्डी को भी धागे से सख्ती से बाँध दिया था और सब्जेक्ट के होंश में आने तक प्रतीक्षा करता रहा था। फिर उसे उसके निवास स्थान तक सावधानी से पहुंचा दिया था। उसकी स्थिति कैसी है ? इस चिंता में स्कूल का समय किसी तरह से काटा। हांलाकि जगदीश सर से काफी प्रशंशा मिला था, क्योंकि मेरा प्रायोगिक विवरण क्लाश में सबसे अच्छा हुआ था। उन्हें मेरी आर्थिक स्थिति की जानकारी थी, इसलिए उन्होंने मुझे सभी से प्रयोग करने और उसके लिए अबश्यक यंत्रो को मैंने कैसे जोगद लगाया था उसका विवरण देने को भी कहा था। सभी मित्रों के लिए मैं एक उदाहरन बन गया था। फिर भी मुझे ख़ुशी से अधिक चिंता सता रही थी की मेरे सब्जेक्ट की स्थिति न जाने कैसी है। क्या वोह फिर से चल रहा होगा? आसानी से कूद प् रहा होगा?
स्कूल से लौट कर मेढकों के रहने की जगह पर गया, जहाँ सब्जेक्ट को मैंने छोड़ा था। उसकी स्तिथि देख कर मुझे रोना आ गया। वह घिसट रहा था। उसके सामने का एक पैर अब किसी काम का नहीं रहा था। वह जिन्दा था और बाकि तीन पैरों पर चलने की कोशिश कर रहा था। यानि घिसट रहा था। मैं अन्दर ही अन्दर कांप सा गया और उसको जिन्दा रखने के लिए क्या कर सकता हूँ सोंचने लगा। कुछ छोटे-छोटे कीड़ों को पकड़कर उसके सामने रखा। भूखा तो वोह था ही एक जगह पड़े पड़े कितना शिकार कर पाता? जल्द ही उसने उन कीड़ों का भोजन करने के बाद अपने गोल-गोल आँखों से देखा जैसे कह रहा हो की तुमने मुझ पर कोई उपकार नहीं किया ये तो तुम्हारा कर्त्यब्य था। अब उसे सहारा देकर वहां से उठाया और छाहँ में रख दिया। ऐसा लगा जैसे उस जीव को अपने प्रयोग के स्वार्थ के लिए उपयोग करके बहुत बड़ा अन्याय किया था। अब उसे थोड़ी सी आराम देकर कुछ शांति मिला। तै कर लिया की अब उसके भोजन की व्यवस्था मैं ही करूँगा। दो-चार दिन उसे उसी जगह पर ईमानदारी से भोजन देता रहा था लेकिन एक दिन उसे वहां पर नहीं पाया। धीरे-धीरे मैं उसे भूलने लगा था। लेकिन एक दिन खेलते हुए उसी जगह पर पहुँच गया जहाँ से मैंने उसे प्रयोग करने के लिए पकड़ा था। देखा ! कि चाहरदीवारी के नीचे एक बिल के बाहर वह पड़ा हुआ था और एक दूसरा मेढक छोटे-छोटे कीड़ों को पकड़कर उस तक पहुंचा रहा था। मैं देखता ही रह गया।

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