१५ सितम्बर से ३० सितम्बर तक सभी सरकारी कार्यालयों में हिंदी पखवारा मनाया जाता है। कार्यालय के सभी कार्य हिंदी में करने के लिए कर्मचारियों को प्रोत्साहित करने के लिए यह कार्यक्रम वर्षो से किया जा रहा है। हिंदी भाषी राज्यों में भी हिंदी को प्रोत्साहित करने के लिए इस पखवारा आयोजन किया जाता है। मुझे आश्चर्य इस बात का है की हिंदी भाषी राज्यों में जहाँ सभी की मातृभाषा हिंदी है, में भी हिंदी को प्रोत्साहित करने की आबश्यकता है? यह प्रोत्साहन यदि दुसरे भाषाई राज्यों के लिए हो तो उसका कुछ औचित्य भी हो सकता है। उदाहरनार्थ बंगाल, उरिश्या या दक्षिण के राज्यों में हिंदी की प्रोत्साहन के लिए इस कार्यक्रम का औचित्य है। इस पखवारे के दौरान हिंदी में कार्य करने के लिए सख्त निर्देश जारी किया जाता है। फिर भी बड़े पदाधिकारी अंग्रेजी में ही सभी कार्य करते हैं। पखवारे के अंतिम दिन समापन समारोह का कार्यक्रम में कीच प्रतियोगिता का भी आयोजन होता है जिसमे पुरष्कार राशी का बितरण होता है। केबल पुरस्कार राशी प्राप्त करने के लिए उस दिन प्रतियोगी हिंदी में लिखते हैं और जाहिर है की अच्चा ही लिखते हैं। हिंदी भाषी राज्यों के सरकारी कार्यालयों में तो फिर भी ९० प्रतिशत कार्य हिंदी में होता है पर केंद्र सरकार के कार्यालयों में तो शायद ही २० प्रतिशत कार्य हिंदी में होता है। हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी का यदि यह हाल है तो अन्य भाषाई राज्यों में हिंदी की स्तिथि का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। वर्षों से, हिंदुस्तान में, जहाँ का राष्ट्रभाषा हिंदी है, को प्रोत्साहित करने के लिए lakhon की राशी खर्च की जाती है बावजूद आज भी अंग्रेजी भाषा के सामने हमारी राष्ट्रभाषा की स्तिथि दोयम दर्जे का ही रह गया है। क्या यह शर्म की बात नहीं ? दुनिया के अन्य देशों के राजनेता जब कभी हमारे देश में आते है और किसी भी तरह के भाषण या विचार व्यक्त करते है तो अपनी ही भाषा का प्रयोग करते है और अनुवादक उस भाषा को हिंदी य अंग्रेजी में अनुवाद करते रहते हैं। जबकि हमारे देश के राजनेता अन्य देशों में जाकर हिंदी नहीं वल्कि अंग्रेजी भाषा में बात करना अपनी शान समझते है। जबकि वहां भी अनुवादक उपलब्ध रहता है। इसीलिए उच्च वर्ग के तथाकथित विद्वानों के लिए हिंदी अनपढ़ और गवांरो की भाषा बनकर रह गया। जिस देश के प्रबुध वर्ग और राज्नेतावों को हिंदी बोलने में संकोच और शर्म महसूस होता हो वहां के आम जनता से क्या आशा किया जा सकता है। आज के युवायों को क्या दोष दिया जाये, उन्हें अपने करियर के लिए अंग्रेजी सीखना और इस भाषा में पारंगत होना ही पड़ता है. उन्हें क्या पता की एक सुनियोजित षडयंत्र के तहत राष्ट्रभाषा हिंदी को किनारे करते हुए अंग्रेजी भाषा का महत्व दिया जाता रहा। मुझे अंग्रेजी भाषा से कोई शिकायत नहीं है । मैं यह मानता हूँ की अंग्रेजी सीखना आवश्यक है, पर राष्ट्रभाषा से अधिक महत्व में इसे कभी नहीं दे सकता। हम हिंदी में हँसते है, रोते है, अपने सभी मनोभावों को हिंदी में ही प्रकट करते है, फिर भी अपने को बिद्वान और पढ़े लिखे दिखने के लिए अंग्रेजी में बात करना अपनी शान समझते है। जबकि अंग्रेजी एक सहज भाषा है और थोड़ी सी प्रयास से ही इस भाषा को आसानी से सिखा जा सकता है। मैं अपने आस पास के ऐसे कई व्यक्ति को जनता हूँ जिनका प्रारंभिक शिक्षा हिंदी में ही हुई है पर आज वे ही कहते हैं की यार ये हिंदी मेरे समझ में नहीं आता। अंग्रेजी में लिखा होता तो आसानी से इसका अर्थ बता सकता हूँ। इस तरह के लोग मेरे नज़र में राष्ट्रद्रोही हैं। चाहे वह कोई भी क्यों न हो। जिन्हें अपने राष्ट्रभाषा पर गर्व न हो उसे अपने देश पर गर्व नहीं हो सकता। राष्ट्रभाषा का उन्नति पर ही देश की उन्नति निर्भर हो सकता है।
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