Saturday, December 4, 2010

गंध

नौकरी के सिलसिले में इस शाहर में आया था। अकेले रहने के लिए एक कमरे की जरुरत थी। लेकिन कुंवारे लड़के को भाड़े पर कमरा देने के लिए कोई तैयार नहीं हो रहा था। फिर ऑफिस के ही एक सज्जन की सहायता से उनके एक परिचित के घर के बाहरी हिस्से में बने यह कमरा रहने के लिए मिल गया। इस कमरे की एक मात्र खिड़की गली की और खुलता था और गली का यह हिस्सा थोडा अँधेरा था। इस गली से आते जाते लोग उस खिड़की के निचले हिस्से के दीवाल को मूत्रालय के रूप में उपयोग किया करते थे। वेचारा सुबह-सुबह नास्ता करके आठ बजे के लगभग कमरे से निकल जाता और रात होने पर थका हरा लौटा था। अक्सर रात का खाना खाकर ही आया करता। लेकिन रात को पेशाब के दुर्गन्ध से उसे रात भर नींद नहीं हो पता था। एक दिन इस दुर्गंधित समस्या का समाधान करने के लिए वह सुबह मुह अँधेरे उठ कर दीवाल पर सफ़ेद चुने से लिख दिया" देखो, गधा पेशाब कर रहा है "। लोग गधा कहलाने के लिए तैयार थे इसलिए समस्या जहाँ का वहां ही रहा। दो-चार दिन बाद उसने वहाँ लिखा "यहाँ पेशाब करने वाले पकडे जाने पर पचास रुपये दंड देना परेगा"। ताजुब दो - चार दिन पेशाब का गंध कुछ कम था उसे अगरबत्ती जलाकर ही पूरा किया गया। नींद की गोली की आवश्यकता नहीं हुई। अगली सप्ताह आते आते गंध समस्या विकराल रूप ले चूका था। मजबूर होकर उसने मोहल्ले के नवजवानों के पास इस समस्या को रखा और यह भी कहा की यदि इसका कोई समाधान नजर नहीं आये तो कृपया कहीं एक दुसरे जगह एक कमरा दिलाने में उसकी मदद करे ताकि वह रोजी रोटी कमाने के लिए इस शाहर में रहा सके। लड़के अछे थे। उसके कमरे के निचे पेशाब करने वालों को क्यासे रोका जय? इस विषय पर उन्होंने गहरी विचार विमर्स के बाद भी कोई उपयुक्त समाधान मिल नहीं रहा था। अचानक उनमे एक ने कहा " मस्त कलंदर, समाधान मिल गया। कल सुबह देखना। वह रहस्य को लेकर कमरे की और लौट गया।
सुबह सुगन्धित अगरबत्ती के गंध से उसका नींद टुटा। खिड़की खोलते ही उसने देखा की ठीक खिड़की के पास एक बार कला पत्थर को लाल रंग से रंगकर किसीने दीवाल पर लाल रंग से ही लिख दिया था जय बजरंग बलि
अब पेशाब के गन्ध की जगह अगरबत्ती की सुगंध था लेकिन वह अब भी पदेशन था क्योंकि अब सुगंध से उसकी नींद नहीं आती।

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