- चार-पांच साल पहले कुछ बकाये रुपयों के बदले किसी ने गाय की एक बछिया पिताजी को देकर गया था। इसकी देखभाल की जिम्मेवारी मुझ पर दी गयी थी। बछिया, बुधवार के दिन हमारे घर पर आई थी, इसलिए उसका नामकरण किया गया 'बुधी'। कुछ ही दिनों में यह बछिया घर के सभी सदस्यों के साथ घुल-मिल गयी थी। उसे कभी खूंटे से बांध कर नहीं रखा जाता था। सुबह जब हम भाई-बहने माँ के पास नास्ते के लिए आकर बैठते- तब बुधी भी माँ के सामने आकर खड़ी हो जाया करती थी। हमलोगों के जैसा ही उसे भी दो रोटियों में गुड का एक टुकड़ा मोड़कर दिया जाता- तभी वह मैदानों में घास चरने के लिए निकलती थी।
- बुधी को बेल खाना बेहद पसंद था... कभी-कभी वह घास चरति हुई दूर निकल जाती थी। शाम तक घर नहीं लौटने पर, उसे लाने के लिए मुझे भेज दिया जाता था। मुझे पता रहता था की वह किस तरफ गयी होगी।
- उसे ले आने से पहले मैं पास के पेड़ से एक बेल तोड़ लिया करता और दोनों हथेलियों को मुहं के पास घेरा बनाकर एक विशेष दिशा की ऑर करके, जोर से उसका नाम लेकर चिल्लाता... "बू...ध...ई...ई..." दूर कहीं से उसकी आवाज सुनाई पड़ती...." ह...म...म..आ...आ...आ.." बुधी पूंछ खड़ी करके अपनी सर को हिलाती हुई दौड़ती आती दिखाई पड़ती। मैं उसे बेल दिखाते हुए दौड़ पड़ता घर की ऑर... घर पर आकर भी, उसे तंग करने के लिए कुछ देर तक बेल को उसके मुहं के पास ले जाकर ऊपर-नीचे करता रहता.... आखिर तंग आकर वह अपने छोटे-छोटे सींगो वाली माथा से मुझे दीवाल पर दबाकर खड़ी हो जाती... मुझे चिल्लाते हुए सुनकर, माँ आँगन में निकल आती और मुझे डांटते हुए बेल लेकर उसे दे देती थी। कई बार किसी शैतानी के कारण यदि माँ हम में से किसी को मारने लगती तो बुधी माँ पर भी खफा हो जाती और अपने माथे से उसे ठेल दिया करती... माँ हंसती हुई कहती... " तू तो बच्चों को बिगाड़ देगी, शैतानी करेगा तो मारूंगी नहीं ?" वह सर हिलाती रहती। जैसे कहा रही हो की "हाँ, इन्हें मत मारो ..." अक्सर ऐसा लगता था की वह हमारी सभी बातों को समझती है केवल शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाती।
- दोपहर के भोजन के समय भी वह हाजीर रहती थी, उसे भी मिटटी के एक छोटे वर्तन में दाल-भात और सब्जियां दी जाती थी। दशहरा के समय जब हमारे लिए नये कपडे लाये जाते थे तब उसके गले में भी बड़ी कंचों की मोतियों की माला और सींगों पर लाल रिबोन बांधा जाता था।
- पडोश के लोग मजाक में कहते... "ये तो भैया की एक और लड़की है"
- दूध सी सफ़ेद, बुधी के, सींगों के बीचों-बीच माथे पर मयूर पंख जैसा एक काला दाग था। बुधी सुध्ध देशी गाय थी। इसलिए उसके सिंग भी छोटे-छोटे थे। हर एक-दो दिन के अंतराल पर मैं या पिताजी उसे नदी पर नहाने ले जाया करते थे। नहाना उसे खूब पसंद था। घर के सभी का प्यार और जतन से उसका सौंदर्य दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा था। कभी-कभी वह पास के सब्जियों के खेत में भी घुस जाया करती। कई बार उसे लोग अथक प्रयास से पकड़कर कांजी हायूस में बंद कर दिया करते थे। शाम तक जब वह घर नहीं लौटती तब दुसरे ही दिन पिताजी कांजी हायूस पहुँच जाते और कुछ रुपये दंड देकर उसे छुड़ाकर ले आया करते।
- ऐसा ही एक बार उसे लाते समय, जब वह मोहल्ले में पहुँच गयी, तो पहचाने हुए रास्ते को देखकर घर आने के लिए दौड़ पड़ी.... पिताजी रस्सी के झटके को संभाल नहीं पाए और रास्ते के किनारे पड़े हुए एक टूटे कांच के बोतल पर गिर पड़े.... उनकी हथेली काफी गहराई तक कट गयी। पिताजी पास के ही एक दवा दुकान से हाँथ पर पत्तियां बंधवा कर लौटे। उन्होंने आकर देखा की बुधी अपने नांद में में से खा रही थी। दो-तिन दिन की भूखी बुधी का पेट अब तक भर चूका था। पिताजी को देखकर वह उनके पास आई और उनके चोट लगे हांथो को अपने जीभ से सहलाने लगी।
शायद पहली बार हम बच्चों ने पिताजी के आँखों में आंशु देखे थे....
- अगले ही वर्ष बुधी एक बच्ची की माँ बन गयी थी.... हम सभी उसके बछिया को देखकर खुश हो गए थे।
- दूध निकलने के लिए उसके पैरों को कभी बांधा नहीं जाता था। वैसे भी वह कुल्लम दो-तीन किलो से अधिक दूध नहीं देती थी। उसपर माँ और पिताजी भी, इस बात का ध्यान रखते थे, की उसके बच्चे के लिए दूध कम न पड जाये। ठण्ड के दिनों में एक पुराने कम्बल को उसके पीठ पर बांध दिया जाता था। उस समय अमीरों के घर पर ही बिजली के पंखों का चलन हुआ करता था। हमारे घर पर बिजली के पंकें नहीं थे। अन्यथा शायद पिताजी उसके रहने के जगह पर पंखा भी लगा देते।
- बुधी, इसी तरह आराम और अपनत्व भरी जीवन जी रही थी।
- विगत दो-तिन सालों से इस राज्य पर भगवान् ईन्द्रदेव की कृपा दृष्टि नहीं हुई थी। वर्षा पर निर्भर इस राज्य में पैदावार नहीं के बराबर हुई थी। सूखे की मार से जनता त्राहि-त्राहि कर रही थी। हमारे कसबे के बाजार से अनाज गायब हो गए थे। जितने भी मिल रहे थे उसके दाम आसमान छू रहे थे। उसे खरीदकर खाने की आर्थिक स्थिति अधिकतर लोगों में नहीं था। दूर-दूर तक, सूखे हुए खेतों में कई वर्षों तक पानी की कमी से दरारें पड़ चुके थे। नदी, तालाव और आस-पास के सभी कुवें पूरी तरह सुख चुके थे। बड़े-बड़े पेड़ो में अभी भी कुछ पत्तियां दीख जाता था। झाड़ियों के पत्ते सुख कर नीचे पड़े हुए थे। सूखे मैदान और खेतों में गाय, भैंशे, बकरियां और दुसरे जानवर भूख से व्याकुल होकर घूम रहे थे। शायद कहीं कुछ घास-पत्ती नजर आ जाये, और वे कई दिनों से खाली पेट में कुछ डाल सकें। कहीं भी दूर से हरी पत्तियां दिख जाता तो सभी उस पर टूट पड़ते। बड़े-बड़े सिंग वाले ही अक्सर इन पत्तियों को खाने में सफल हो पाते थे ।
- अनाज के साथ-साथ पानी के लिए भी हाहाकार मची हुई थी। नगरपालिका के नल पर एक निश्चित समय तक ही पानी की आपूर्ति की जा रही थी। मोहल्ले में एक ही नल था, जिस पर रात रहते ही लोग बाल्टियों और हांडियों के कतार लगा देते थे। दस आदमी के उपयोग लायक पानी को सौ लोगों में बांटा जाता था। किसी को भी पीने लायक पानी भी पूरा नहीं पड़ता। नल पर- लगभग रोज ही गाली -गलौज, और मार-पिट लगा ही रहता था।
यह क़स्बा नुमा शहर एक पहाड़ी नदी के किनारे बसा था। जिनके घर नदी के किनारे या आस-पास ही थे, वे सुखी नदी के बालू को खोद कर पानी निकालते और सावधानी से उस पानी को अपने हांडियों में साफ़ कपड़ों से छानकर इकठ्ठा कर लेते।
- दिन गुजर रहे थे और अगला दिन और भयावह बनता जा रहा था। लगभग रोज ही इस शांत कसबे में कई लूट और चोरी-डकैती की वारदातों की खबर आ रही थी।
- पिताजी को अपनी साधारण आय से घर चलाना दिनों-दिन कठिन होता जा रहा था। अक्सर हमें भूखे ही रहना पड़ रहा था। राशन के दुकान पर मिलने वाले चावल और गेहूं के लिए घंटों हम बच्चे पारा- पारी लाईन में खड़े रहते। अधिकतर दिन खाली हाँथ लौटना पड़ता। जब भी कहीं से खबर मिलता की अमुक जगह मुफ्त में गेहूं की दलिया, चावल या पौडर दूध मिल रहा है तो हम बच्चे छोटे-छोटे झोले लेकर पहुँच जाते। मुफ्त में पाए जाने वाले उन चावलों में इतनी दुर्गन्ध होती थी की निगलना असंभव लगता था लेकिन भूख..... निगलने तक ही ख़राब लगता... गले से निचे उतारते ही सब ठीक हो जाता था।
अपना ही ये हाल था तो बुधी के लिए चारा, भूषि कहाँ से आ पाता...? इनके दाम भी इतने अधिक हो गए थे की उसे खरीदकर खिलाना पिताजी के सामान्य रोजगार में संभव नहीं हो पा रहा था।
- अक्सर पिताजी या माँ भूख नहीं रहने का बहाना करके, अपने हिस्से के चावल-दाल बुधी के नांद में ड़ाल दिया करते थे।
- बड़े होने के बाद, समझ में आया था की क्यों उनको भूख नहीं लगती थी....
- फिर भी बुधी और उसकी बछिया दुबलाती जा रही थी। माँ-पिताजी के साथ-साथ हम बच्चों का स्वस्थ भी दिनों-दिन कमजोर पड़ता जा रहा था। बुधी के साथ-साथ हम बच्चों के दुबले और हड्डियाँ निकले हुए शारीर को देखकर माँ और पिताजी की रातों की नींद और दिन का चैन शेष होता जा रहा था।
- आखिर एक दिन वे आपस में सलाह करके बुधी को किसी ऐसे व्यक्ति के पास भेजना तय किये जहाँ उसे भर पेट भोजन मिल सके।
- कसबे से दो-तिन मिल दूर एक छोटा गावं था। वहां एक सज्जन के पास कई गाये -भैंसे थी । वे पिताजी के मित्रों में से ही थे, इसलिए वे बुधी को अपने पास रखने के लिए राजी हो गये।
एक-दो दिन बाद उनका एक आदमी आया बुधी को ले जाने के लिये। पिताजी को पता था की उनका आदमी किस दिन बुधी को ले जायेगा। इसलिए वे सुबह ही किसी को कुछ बताये बिना घर से निकल गये थे। उस अनजान आदमी को देखते ही, बुधी को जैसे इस घर से हमेशा के लिये जाने का पुर्बाभास हो गया था। वह आदमी बुधी को ले जाने के लिये उसका रस्सी पकड़कर खींचने का कोशिश करने लगा... पर बुधी अपने दुर्वल शारीर की सारी शक्तियों को इकठ्ठा करके, चारों पैरों को आँगन में जमाकर खड़ी हो गयी। वह आदमी जब उसे ले जाने में असफल रहा, तो एक छड़ी से पीट कर उसे ले जाने का प्रयास किया। हम सभी जोर-जोर से रो रहे थे और माँ से विनती कर रहे थे बुधी को नहीं ले जाने देने के लिये.... पर उनके मजबूरी को समझने लायक उम्र हमारी नहीं थी। माँ खुद भी रो रही थी... आखिर माँ ने ही तो उसे इतने सालों से पाल-पोसकर बड़ी किये थे। अचानक, उस आदमी द्वारा बुधी को पिटते देखकर मेरी अत्यंत शांत माँ की जोर से बोलते हुए सुना..." ऐ, ख़बरदार उसे मारा तो..." शायद पहली बार माँ को इतनी जोर से किसी को डांटते हुए सुना था। उनका आवाज सुनकर हम डर से खुद ही रोना बंद कर दिए थे...
- बुधी अपनी असहाय, दुर्वल, और निरीह बड़ी-बड़ी आँखों से, जो भूख और कमजोरी के कारन अब अन्दर की ऑर धंश गया था, को उठाकर माँ की ऑर देख रही थी... जैसे कह रही हो की, मुझे किस दोष के कारन अपने से अलग कर रही हो.....?
- फिर सबसे कष्टकर समय मेरे लिये आया। जब माँ का आदेश हुआ- "मुन्ना, तू ही बुधी को लेकर जा, गावं के पास जाकर रस्सी इसके हाँथ में दे देना और जल्दी लौट आना"
- मेरे लिये यह काम इतना कठिन था, की इसके बदले मैं कोई भी कठिन से कठिन दंड भोगने के तैयार था, पर माँ की आदेश का अवहेलना करना असंभव था। इसलिए यह कष्टकर काम मुझे ही करना पड़ा। जिस बुधी के साथ बचपन से लेकर अबतक खेलते हुए, चरते हुए, नहलाते हुए, खाना खिलते हुए और बेल लेकर शैतानी करते हुए गुजरा था, उसी बुधी को एक हाथ में बेल लेकर और दुसरे हाथ में रस्सी लेकर मैं जा रहा था उस गावं की ऑर जहाँ से शायद वह कभी लौट कर नहीं आएगी।
- सारा रास्ता बुधी चुपचाप मेरे साथ उस गावं की ऑर चल दी...क्या वह इस बिश्वाश के साथ मेरे साथ जा रही थी की मैं उसे किसी मैदान में घास चरने के लिये ले जा रहा हूँ ? नहीं, तब मेरे हांथों में बेल नहीं होता।
- आखिर जब मैं गावं के पास पहुंचा तब अपने हांथो से पहले उसे उस बेल को खिलाया, आज मैं उसे बेल से ललचा नहीं पाया, वल्कि बेल को तोड़कर खुद ही उसके मुहं के पास पकडे रहा ताकि उसे खाने में असुविधा न हो।
- उसका खाना ख़त्म होते ही मैं रस्सी को उस आदमी के हाँथ में पकड़कर बिना पीछे मुड़कर देखे दौड़ते हुए लौट गया।
- मैं घर तक पहुँच भी नहीं पाया था की बुधी अपनी चिर-परिचित आवाज से रंभाते हुए घर पर लौट आई थी।
- दुसरे दिन पिताजी खुद ही उस आदमी के साथ बुधी को लेकर गावं तक गये और अपने मित्र को उसे सौंप कर लौट आये। समय के साथ-साथ बुधी हमलोगों को भूल गयी। लेकिन नहीं....
- कई साल बाद एक विवाह समारोह में हम सभी उन्ही सज्जन के घर पर गये.... आँगन के एक कोने में बुधी को देखकर मेरी छोटी बहन आनंदातिरेक में चिल्लाई " माँ, भैया, देखो वह बुधी है न..." बुधी भी हमलोगों का आवाज सुनकर अपनी नांद में से अपनी मुह उठाकर देखी... माँ के साथ-साथ हम लोग भी उसके पास गये... माँ जैसे ही उसकी माथे को सहलाने लगी, वह भी अपनी जीभ से माँ को सहलाने लगी...
- बुधी की आँखों से अंशु लगातार बह रहे थे... माँ के साथ-साथ-साथ हम सभी भी रो रहे थे।
आज इतना ही। आगे की कहानी फिर कभी। शुभ रात्रि।
- बुधी को बेल खाना बेहद पसंद था... कभी-कभी वह घास चरति हुई दूर निकल जाती थी। शाम तक घर नहीं लौटने पर, उसे लाने के लिए मुझे भेज दिया जाता था। मुझे पता रहता था की वह किस तरफ गयी होगी।
- उसे ले आने से पहले मैं पास के पेड़ से एक बेल तोड़ लिया करता और दोनों हथेलियों को मुहं के पास घेरा बनाकर एक विशेष दिशा की ऑर करके, जोर से उसका नाम लेकर चिल्लाता... "बू...ध...ई...ई..." दूर कहीं से उसकी आवाज सुनाई पड़ती...." ह...म...म..आ...आ...आ.." बुधी पूंछ खड़ी करके अपनी सर को हिलाती हुई दौड़ती आती दिखाई पड़ती। मैं उसे बेल दिखाते हुए दौड़ पड़ता घर की ऑर... घर पर आकर भी, उसे तंग करने के लिए कुछ देर तक बेल को उसके मुहं के पास ले जाकर ऊपर-नीचे करता रहता.... आखिर तंग आकर वह अपने छोटे-छोटे सींगो वाली माथा से मुझे दीवाल पर दबाकर खड़ी हो जाती... मुझे चिल्लाते हुए सुनकर, माँ आँगन में निकल आती और मुझे डांटते हुए बेल लेकर उसे दे देती थी। कई बार किसी शैतानी के कारण यदि माँ हम में से किसी को मारने लगती तो बुधी माँ पर भी खफा हो जाती और अपने माथे से उसे ठेल दिया करती... माँ हंसती हुई कहती... " तू तो बच्चों को बिगाड़ देगी, शैतानी करेगा तो मारूंगी नहीं ?" वह सर हिलाती रहती। जैसे कहा रही हो की "हाँ, इन्हें मत मारो ..." अक्सर ऐसा लगता था की वह हमारी सभी बातों को समझती है केवल शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाती।
- दोपहर के भोजन के समय भी वह हाजीर रहती थी, उसे भी मिटटी के एक छोटे वर्तन में दाल-भात और सब्जियां दी जाती थी। दशहरा के समय जब हमारे लिए नये कपडे लाये जाते थे तब उसके गले में भी बड़ी कंचों की मोतियों की माला और सींगों पर लाल रिबोन बांधा जाता था।
- पडोश के लोग मजाक में कहते... "ये तो भैया की एक और लड़की है"
- दूध सी सफ़ेद, बुधी के, सींगों के बीचों-बीच माथे पर मयूर पंख जैसा एक काला दाग था। बुधी सुध्ध देशी गाय थी। इसलिए उसके सिंग भी छोटे-छोटे थे। हर एक-दो दिन के अंतराल पर मैं या पिताजी उसे नदी पर नहाने ले जाया करते थे। नहाना उसे खूब पसंद था। घर के सभी का प्यार और जतन से उसका सौंदर्य दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा था। कभी-कभी वह पास के सब्जियों के खेत में भी घुस जाया करती। कई बार उसे लोग अथक प्रयास से पकड़कर कांजी हायूस में बंद कर दिया करते थे। शाम तक जब वह घर नहीं लौटती तब दुसरे ही दिन पिताजी कांजी हायूस पहुँच जाते और कुछ रुपये दंड देकर उसे छुड़ाकर ले आया करते।
- ऐसा ही एक बार उसे लाते समय, जब वह मोहल्ले में पहुँच गयी, तो पहचाने हुए रास्ते को देखकर घर आने के लिए दौड़ पड़ी.... पिताजी रस्सी के झटके को संभाल नहीं पाए और रास्ते के किनारे पड़े हुए एक टूटे कांच के बोतल पर गिर पड़े.... उनकी हथेली काफी गहराई तक कट गयी। पिताजी पास के ही एक दवा दुकान से हाँथ पर पत्तियां बंधवा कर लौटे। उन्होंने आकर देखा की बुधी अपने नांद में में से खा रही थी। दो-तिन दिन की भूखी बुधी का पेट अब तक भर चूका था। पिताजी को देखकर वह उनके पास आई और उनके चोट लगे हांथो को अपने जीभ से सहलाने लगी।
शायद पहली बार हम बच्चों ने पिताजी के आँखों में आंशु देखे थे....
- अगले ही वर्ष बुधी एक बच्ची की माँ बन गयी थी.... हम सभी उसके बछिया को देखकर खुश हो गए थे।
- दूध निकलने के लिए उसके पैरों को कभी बांधा नहीं जाता था। वैसे भी वह कुल्लम दो-तीन किलो से अधिक दूध नहीं देती थी। उसपर माँ और पिताजी भी, इस बात का ध्यान रखते थे, की उसके बच्चे के लिए दूध कम न पड जाये। ठण्ड के दिनों में एक पुराने कम्बल को उसके पीठ पर बांध दिया जाता था। उस समय अमीरों के घर पर ही बिजली के पंखों का चलन हुआ करता था। हमारे घर पर बिजली के पंकें नहीं थे। अन्यथा शायद पिताजी उसके रहने के जगह पर पंखा भी लगा देते।
- बुधी, इसी तरह आराम और अपनत्व भरी जीवन जी रही थी।
- विगत दो-तिन सालों से इस राज्य पर भगवान् ईन्द्रदेव की कृपा दृष्टि नहीं हुई थी। वर्षा पर निर्भर इस राज्य में पैदावार नहीं के बराबर हुई थी। सूखे की मार से जनता त्राहि-त्राहि कर रही थी। हमारे कसबे के बाजार से अनाज गायब हो गए थे। जितने भी मिल रहे थे उसके दाम आसमान छू रहे थे। उसे खरीदकर खाने की आर्थिक स्थिति अधिकतर लोगों में नहीं था। दूर-दूर तक, सूखे हुए खेतों में कई वर्षों तक पानी की कमी से दरारें पड़ चुके थे। नदी, तालाव और आस-पास के सभी कुवें पूरी तरह सुख चुके थे। बड़े-बड़े पेड़ो में अभी भी कुछ पत्तियां दीख जाता था। झाड़ियों के पत्ते सुख कर नीचे पड़े हुए थे। सूखे मैदान और खेतों में गाय, भैंशे, बकरियां और दुसरे जानवर भूख से व्याकुल होकर घूम रहे थे। शायद कहीं कुछ घास-पत्ती नजर आ जाये, और वे कई दिनों से खाली पेट में कुछ डाल सकें। कहीं भी दूर से हरी पत्तियां दिख जाता तो सभी उस पर टूट पड़ते। बड़े-बड़े सिंग वाले ही अक्सर इन पत्तियों को खाने में सफल हो पाते थे ।
- अनाज के साथ-साथ पानी के लिए भी हाहाकार मची हुई थी। नगरपालिका के नल पर एक निश्चित समय तक ही पानी की आपूर्ति की जा रही थी। मोहल्ले में एक ही नल था, जिस पर रात रहते ही लोग बाल्टियों और हांडियों के कतार लगा देते थे। दस आदमी के उपयोग लायक पानी को सौ लोगों में बांटा जाता था। किसी को भी पीने लायक पानी भी पूरा नहीं पड़ता। नल पर- लगभग रोज ही गाली -गलौज, और मार-पिट लगा ही रहता था।
यह क़स्बा नुमा शहर एक पहाड़ी नदी के किनारे बसा था। जिनके घर नदी के किनारे या आस-पास ही थे, वे सुखी नदी के बालू को खोद कर पानी निकालते और सावधानी से उस पानी को अपने हांडियों में साफ़ कपड़ों से छानकर इकठ्ठा कर लेते।
- दिन गुजर रहे थे और अगला दिन और भयावह बनता जा रहा था। लगभग रोज ही इस शांत कसबे में कई लूट और चोरी-डकैती की वारदातों की खबर आ रही थी।
- पिताजी को अपनी साधारण आय से घर चलाना दिनों-दिन कठिन होता जा रहा था। अक्सर हमें भूखे ही रहना पड़ रहा था। राशन के दुकान पर मिलने वाले चावल और गेहूं के लिए घंटों हम बच्चे पारा- पारी लाईन में खड़े रहते। अधिकतर दिन खाली हाँथ लौटना पड़ता। जब भी कहीं से खबर मिलता की अमुक जगह मुफ्त में गेहूं की दलिया, चावल या पौडर दूध मिल रहा है तो हम बच्चे छोटे-छोटे झोले लेकर पहुँच जाते। मुफ्त में पाए जाने वाले उन चावलों में इतनी दुर्गन्ध होती थी की निगलना असंभव लगता था लेकिन भूख..... निगलने तक ही ख़राब लगता... गले से निचे उतारते ही सब ठीक हो जाता था।
अपना ही ये हाल था तो बुधी के लिए चारा, भूषि कहाँ से आ पाता...? इनके दाम भी इतने अधिक हो गए थे की उसे खरीदकर खिलाना पिताजी के सामान्य रोजगार में संभव नहीं हो पा रहा था।
- अक्सर पिताजी या माँ भूख नहीं रहने का बहाना करके, अपने हिस्से के चावल-दाल बुधी के नांद में ड़ाल दिया करते थे।
- बड़े होने के बाद, समझ में आया था की क्यों उनको भूख नहीं लगती थी....
- फिर भी बुधी और उसकी बछिया दुबलाती जा रही थी। माँ-पिताजी के साथ-साथ हम बच्चों का स्वस्थ भी दिनों-दिन कमजोर पड़ता जा रहा था। बुधी के साथ-साथ हम बच्चों के दुबले और हड्डियाँ निकले हुए शारीर को देखकर माँ और पिताजी की रातों की नींद और दिन का चैन शेष होता जा रहा था।
- आखिर एक दिन वे आपस में सलाह करके बुधी को किसी ऐसे व्यक्ति के पास भेजना तय किये जहाँ उसे भर पेट भोजन मिल सके।
- कसबे से दो-तिन मिल दूर एक छोटा गावं था। वहां एक सज्जन के पास कई गाये -भैंसे थी । वे पिताजी के मित्रों में से ही थे, इसलिए वे बुधी को अपने पास रखने के लिए राजी हो गये।
एक-दो दिन बाद उनका एक आदमी आया बुधी को ले जाने के लिये। पिताजी को पता था की उनका आदमी किस दिन बुधी को ले जायेगा। इसलिए वे सुबह ही किसी को कुछ बताये बिना घर से निकल गये थे। उस अनजान आदमी को देखते ही, बुधी को जैसे इस घर से हमेशा के लिये जाने का पुर्बाभास हो गया था। वह आदमी बुधी को ले जाने के लिये उसका रस्सी पकड़कर खींचने का कोशिश करने लगा... पर बुधी अपने दुर्वल शारीर की सारी शक्तियों को इकठ्ठा करके, चारों पैरों को आँगन में जमाकर खड़ी हो गयी। वह आदमी जब उसे ले जाने में असफल रहा, तो एक छड़ी से पीट कर उसे ले जाने का प्रयास किया। हम सभी जोर-जोर से रो रहे थे और माँ से विनती कर रहे थे बुधी को नहीं ले जाने देने के लिये.... पर उनके मजबूरी को समझने लायक उम्र हमारी नहीं थी। माँ खुद भी रो रही थी... आखिर माँ ने ही तो उसे इतने सालों से पाल-पोसकर बड़ी किये थे। अचानक, उस आदमी द्वारा बुधी को पिटते देखकर मेरी अत्यंत शांत माँ की जोर से बोलते हुए सुना..." ऐ, ख़बरदार उसे मारा तो..." शायद पहली बार माँ को इतनी जोर से किसी को डांटते हुए सुना था। उनका आवाज सुनकर हम डर से खुद ही रोना बंद कर दिए थे...
- बुधी अपनी असहाय, दुर्वल, और निरीह बड़ी-बड़ी आँखों से, जो भूख और कमजोरी के कारन अब अन्दर की ऑर धंश गया था, को उठाकर माँ की ऑर देख रही थी... जैसे कह रही हो की, मुझे किस दोष के कारन अपने से अलग कर रही हो.....?
- फिर सबसे कष्टकर समय मेरे लिये आया। जब माँ का आदेश हुआ- "मुन्ना, तू ही बुधी को लेकर जा, गावं के पास जाकर रस्सी इसके हाँथ में दे देना और जल्दी लौट आना"
- मेरे लिये यह काम इतना कठिन था, की इसके बदले मैं कोई भी कठिन से कठिन दंड भोगने के तैयार था, पर माँ की आदेश का अवहेलना करना असंभव था। इसलिए यह कष्टकर काम मुझे ही करना पड़ा। जिस बुधी के साथ बचपन से लेकर अबतक खेलते हुए, चरते हुए, नहलाते हुए, खाना खिलते हुए और बेल लेकर शैतानी करते हुए गुजरा था, उसी बुधी को एक हाथ में बेल लेकर और दुसरे हाथ में रस्सी लेकर मैं जा रहा था उस गावं की ऑर जहाँ से शायद वह कभी लौट कर नहीं आएगी।
- सारा रास्ता बुधी चुपचाप मेरे साथ उस गावं की ऑर चल दी...क्या वह इस बिश्वाश के साथ मेरे साथ जा रही थी की मैं उसे किसी मैदान में घास चरने के लिये ले जा रहा हूँ ? नहीं, तब मेरे हांथों में बेल नहीं होता।
- आखिर जब मैं गावं के पास पहुंचा तब अपने हांथो से पहले उसे उस बेल को खिलाया, आज मैं उसे बेल से ललचा नहीं पाया, वल्कि बेल को तोड़कर खुद ही उसके मुहं के पास पकडे रहा ताकि उसे खाने में असुविधा न हो।
- उसका खाना ख़त्म होते ही मैं रस्सी को उस आदमी के हाँथ में पकड़कर बिना पीछे मुड़कर देखे दौड़ते हुए लौट गया।
- मैं घर तक पहुँच भी नहीं पाया था की बुधी अपनी चिर-परिचित आवाज से रंभाते हुए घर पर लौट आई थी।
- दुसरे दिन पिताजी खुद ही उस आदमी के साथ बुधी को लेकर गावं तक गये और अपने मित्र को उसे सौंप कर लौट आये। समय के साथ-साथ बुधी हमलोगों को भूल गयी। लेकिन नहीं....
- कई साल बाद एक विवाह समारोह में हम सभी उन्ही सज्जन के घर पर गये.... आँगन के एक कोने में बुधी को देखकर मेरी छोटी बहन आनंदातिरेक में चिल्लाई " माँ, भैया, देखो वह बुधी है न..." बुधी भी हमलोगों का आवाज सुनकर अपनी नांद में से अपनी मुह उठाकर देखी... माँ के साथ-साथ हम लोग भी उसके पास गये... माँ जैसे ही उसकी माथे को सहलाने लगी, वह भी अपनी जीभ से माँ को सहलाने लगी...
- बुधी की आँखों से अंशु लगातार बह रहे थे... माँ के साथ-साथ-साथ हम सभी भी रो रहे थे।
No comments:
Post a Comment