Saturday, December 11, 2010

नकफुल

आज की सुबह रोज की तरह नहीं था। आस पास के सात आठ गावों में जैसे उत्सव मनाया जा रहा था। सभी अपने सबसे कम फटे हुए कपड़ों में से जो सबसे साफ़ था को पहनकर तैयार हो चूका था। सुबह की हवा और पेड़ पौधे भी जैसे इस उत्सव में शामिल हो गए थे।
पता
चला की सरैदिहा गावं के बुधना उरांव अपनी जमीन का जो आधा हिस्सा सरकार को स्कूल बनाने के लिए दान में दिया था, उसी जमीन पर सरकार द्वारा एक प्राथमिक ईस्कुल बना दिया गया है। आज उसका उद्घाटन है।
गावं के सभी ने मिलकर विद्यालय के प्रांगन और आस-पास के जगह को साफ करके गोबर से लिप कर तैयार कर दिया था। तालावों और जंगलों में मिलने वाले फुल, पत्तियों, केले के पौधों से विद्यालय को सजाया गया था।
सर्व शिक्षा अभियान के निदेशक श्री बंशीधर बाबु की इच्छा थी की इस विद्यालय का उद्घाटन उन्ही से करवाया जाए, जिनके पति ने विद्यालय की स्थापना के लिए अपनी थोड़ी सी जमीन में से आधा हिस्सा दान दिया था। मुखिया जी की भी यही इच्छा थी।
बुधना उरांव की विधवा सोमरी उरयीन को खबर दिया जा चूका था। विद्यालय प्रांगन में सौ दो सौ महिला, पुरुष और बच्चे उसका इंतजार कर रहे थे......
गावं के सभी बड़े और बच्चे सोमरी नानी का बेहद इज्जत करते थे। सभी जानते थे की उनके एक मात्र लड़के के साथ क्या हुआ था और क्यों बुधना अपनी जमीन को विद्यालय बनाने के लिए सरकार को दान दिया था।
सोमरी अपनी फूस की झोपडी में आज अपने पुत्र और पति की याद में आंशु बहा रही थी। आज वह अकेली थी, लेकिन कभी उसका भी तो एक हँसता मुस्कुराता परिवार था। वह सोच रही थी, कितने दिन हो गए ?.... हाँ, दस साल.... उसे ऐसा लग रहा था जैसे कुछ ही दिन पहले की ही तो बात है, जब उसका बेटा पैदा हुआ.... मंगल वार का दिन था.... उसे याद है.... बुधना उस गोल-मटोल बेटे को गोद में लेकर तो जैसे पागल ही हो गया था.... नामकरण के दिन उसने गावं के सभी को नेओता दिया था.... सब को भर पेट भात, मांश और हडिया खिलाया था। गावं का पाहन बेटे का नाम रखा था मंगरा.... शुभ दिन- शुभ नाम ???? बुधना खुद भी हडिया पीकर मतवाला हो गया था। खूब जोर-जोर से, चिल्लाकर सबको बता रहा था, की वह बेटा को खूब पढ़ायेगा.... फिर उसका बेटा मास्टर बनकर आस-पास के गावं के बच्चों को पढ़ायेगा ......बुधना सपना खूब देखता था ... उसके याद में सोमरी के आँखों में आंशुं के साथ-साथ होंठों में हंशी भी आ गया।
फिर वह दिन आया जब बुधना छे साल के मंगरा को साईकिल पर बैठाकर तिन कोस दूर रनियां गावं में ले गया था, ईस्कूल में भर्ती करने। बेटा पढ़ लेगा तो औरों को भी पढ़ायेगा, सूद खोर बनिया और सरकारी बाबु लोग, जो गावं के अनपढ़ लोगों को कानून का डर दिखाकर लुटता है उनसे बचाएगा। तबतक ऐसा कोई भी तो नहीं था, जो इतना भी पढ़ालिखा हो की बनिया के उधारी का हिसाब या सरकारी बाबुओं के बातों को समझ सके।
बनिया को बुधना के इरादे का पता चल गया था, प्रखंड कर्मचारी भी नहीं चाहता था की गावं का कोई भी पढ़-लिख सके क्योंकि इससे तो उनके कुत्सित चाल को अंजाम तक पहुँचाना संभव नहीं हो पायेगा। इसलिए उनके लिए यह जरुरी था की शीक्षा का बीज पनपने से पहले ही मिटा दिया जाये।
बुधना फिर कभी रनियां के इस्कूल तक बेटे को लेकर पहुँच नहीं पाया। बनिया के गुंडे उन दोनों को रस्ते में ही ......
कितना रोई थी सोमरी........ उन दोनों का लाश जब गावं में लाया गया , तो खून से सने बाप-बेटे को देखकर सोमरी केवल हाय, ही कह पाई थी...... सदमे से वह अचानक चुप हो गयी थी.... आंशु जैसे उसके आँखों तक आकर सुख चुके थे..... सभी जानते थे की उनके साथ कौन और क्यों ऐसा किया था। लेकिन गावं के अधिकतर लोग, इतना की मुखिया तक बनिया का कर्जदार था. इसलिए सब कुछ जानते हुए भी वे चुप थे। सबसे ज्यादा हाय -हाय तो बनिया ही किया था...... उसका मंशा तो कुछ और भी था, पर जंगलों में पली बड़ी मजबूत देह काठी के सोमरी को काबू करना आसान नहीं था। बनिया इस मामले को अपने स्तर से ही थाने में जाकर दारोगा को कुछ ले देकर ख़त्म कर चूका था। वह काफी दिनों तक बुधना के बाकि बचे जमीन को हथियाने का कोशिश किया, पर एकमात्र बुधना ही तो था जो उसका कर्जदार नहीं था। इसलिए उसका कोशिश बेकार गया। गावं के लोग भी सोमरी के पीछे थे, इसलिए भी वह सोमरी को परेशान करने का साहस नहीं कर सका।
उरयिन को तब तक तो यह भी पता नहीं था की जमीन का आधा हिस्सा बुधना इस्कूल बनाने के लिए सरकार को दे चूका है। वह तो गावं के लोगों की सहायता से उस जमीन पर दो साल पहले तक खेती-बारी कर रही थी। पति और लड़के को भूलने के लिए, वह सूरज उगने से पहले ही खेत में पहुँच जाती और शाम तक खेत में ही गुजार देती थी। गावं के सभी उसे हर तरह से सहायता करते थे। उस अकेली जान के लिए खेत का पैदावार काफी से भी ज्यादा था। फसल के दो तिहाई हिस्सा वह गावं के जरुरतमंदो को बाँट दिया करती थी। बचा हुआ अपने लिए रखती थी।
उस दिन की बात उसे आज तक याद है जब उसके जमीं पर कुछ सरकारी आदमी कुदाल और फावरा लेकर आये थे और बताया था की वहां एक इस्कूल बनेगा। सुनकर वह काफी देर तक ठगा सा खड़ी रही थी। फिर जब मुखिया जी ने कहा था की बुधना उस जमीन को इस्कूल बनाने के सरकार को दिया है तब उसे पता चला था की उसका पति अनपढ़ होकर भी कितना समझदार था। इस्कूल बनाने वाले साहब ने जब उसे उद्घाटन के दिन पहला इंटा रखने के लिए कहा था......
सुबह पास के तालाव से नहाकर वह झोपडी में आयी थी। न जाने कितने दिनों के बाद.... शादी के समय, मायके से लाई टिन के बक्शे को खोलकर देख रही थी... उसके शादी का जोड़ा और बुधना का धोती-कुरता, उसमे रखे हुए उसका बांशुरी। जवान बुधना का चेहरा और उसके साथ बिताये वे खुशियों के पल... जब वह पहली बार बुधना के साथ सरहुल के मेले में गयी थी और सहेलियों के साथ मांदर और बांशुरी के धुन पर नाची थी....
आज जैसा ही, उस दिन भी, वह अपने कमर तक लहराते काले बालों में खूब सारा करंज का तेल लगाकर इसी तालाव से नहाकर झोपडी में आई थी। लाल किनारी के दूध सा सफ़ेद साड़ी को उसने अपने सांचे में ढले हुए शरीर पर बांधकर, पैरों में लाल आलता और निकल के पायल पहनकर वह लगभग तैयार हो गयी थी ... सरहुल के मेले में जाने के लिए.... बुधना उसी समय कहीं से दौड़ता हुआ आया था और सजी संवरी उसे देखकर जैसे ठगा सा खड़ा रहा गया था .... मुस्कुराते हुए वह फिर बाहर निकला और लाल पलाश के फूलों का डाल तोड़कर ले आया...
सोमरी के जुड़े में एक-एक फूल को करीने से सजाकर, उसके चेहरे को अपने दोनों हांथों में लेकर वह काफी देर तक उसे देखता रहा था.... " सोमरी, तोएं तो बहुते खपसुरत हे..." सोमरी, शर्मा कर उसके छाती में अपने चेहरे को छुपा ली थी। सरहुल के मेले में वे दोनों अपने संगी-साथी के साथ बांशुरी और मांदर के धुन पर घंटों नाची थी... अभी भी जैसे वे धुन उसके कानों में सुनाई दे रहे थे....
बुधना के पास आज काफी रुपये थे। मेले में वे दोनो खूब मजा किये थे। झूले में झुलना, फिरकी में घूमना, फिर चूड़ियों के दुकान में लाल-पीले चूड़ियों को पहनकर इतराना... अचानक बुधना उसे खींचते हुए एक सोनार के दुकान में ले गया था और सोने का एक नक् फूल अपने हांथों से उसके नाक में पहना दिया था.... और फिर निर्निमेष दृष्टि से उसे देखता रहा था....
सोमरी की ऊँगली आज खुद व खुद उस नक् फूल को छू रहा था... बुधना के स्पर्श को वह महसूस कर रही थी।
सोमरी उसे चुंटी काट कर होश में लायी- "अब चल न, लौटे के वेर हो गया..."
लौटते समय तक, बुधना-सोमरी और उनके सभी संगी-साथी हडियाँ के नशे में मतवाला हो गए थे। हर दस-बीस कदम पर बुधना उसे अपने अंकों में खिंच लेता और उसके चेहरे को देखते हुए... खिलखिलाकर हंस पड़ता था ... और चिल्लाते हुए कह रहा था..." तोएं सब जाने सुन, हमर सोमरी से खपसुरत अऊर कोई नाहीं.... हाँ की ना?" सब संगी-साथी उसके हाँ में हाँ मिलते हुए कह रहे थे... " हाँ, रे बुधना हाँ, तोर सोमरी मन से खपसुरत अऊर कोई नाहीं" कहते-कहते सब मिलकर खूब हंस रहे थे। वेचारी सोमरी लाज के मारे दुहरी हुई जा रही थी। लेकिन बुधना पर इसका कोई असर नहीं हो रहा था। जंगल के रास्ते में एक जगह बुधना रुक गया और बाकि सबको भी ठहरने के लिए कहा, और पास के फूलों से लदे एक सखुए के पेड़ पर चढ़ गया.... सखुए के फूलों की एक डाल तोड़कर नीचे उतरा और सोमरी को एक पत्थर पर बैठाकर उसके जुड़े से मुरझाये हुए पलाश के फूलों को निकालकर सखुए के ताजे फूलों को करीने से सजाने लगा.... फूलों से सजी सोमरी को देखते हुए वह फिर अपने संगी-साथी को बुलाकर कहा था.... " हमर, सोमरी से...." वाक्य पूरा होने से पहले ही सब कह रहे थे "आउर, कोई नाहीं"
बुधना अभी भी सोमरी के चेहरे को निहार ही रहा था। शाम के समय जंगल में अँधेरा कुछ जल्दी ही पसर जाता है। भालू और तेंदुए के निकलने की संभावना भी रहता है। इसलिए संगी-साथी जल्दी गावं लौटने के लिए हडबडा रहे थे। वे बुधना और सोमरी को वर्तमान में लाने के लिए चिल्लाते हुए कहने लगे- " चल रे बुधना, जल्दी-जल्दी घरे चल, फिर भर चाँद के इन्जोरा में सोमरी मन के देखत रहबे"
ऐसा ही हुआ भी था- भोर होने तक बुधना उसके सौंदर्य को निहारता ही रह गया था....
झोपडी के दरवाजे पर बच्चों की कोलाहल सुनकर वह वर्तमान में लौट आई.... बच्चे कह रहे थे- " ए नानी, जल्दी इस्कूल के मैदान में चल ना, सब तोरे ला रुकल हाउ "
" हाँ, बाबु, चल" कहते हुए उसने अपनी झोपडी के दरवाजे को भिडाकर बच्चों के साथ इस्कूल के मैदान की ओर चल पड़ी।
निदेशक महोदय उसी का प्रतीक्षा कर रहे थे। सोमरी को लेकर उन्होंने उद्घाटन के जगह पर आये। छोटी सी गड्ढे में एक नयी ईंट रखी हुई थी , निदेशक महोदय सोमरी के एक हाँथ में एक नयी ईंट और दुसरे में सीमेंट-बालू मिश्रित एक कोरनी देकर कहा- " आप इस सीमेंट -बालू के मिश्रण को इस ईंट में रखकर दुसरे ईंट को इसपर रख दीजिये"
-सोमरी कुछ देर तक ईंट और मिश्रण से भरे कोरनी को हाँथ में लेकर खड़ी रही। फिर दोनों को नीचे रख दिया।
- उसे याद आया, नक् फूल को पहनते समय बुधना उसे कहा था- " इ नक् फूल को तोयें कबहूँ नाहीं उतारबे "
- सोमरी सोच रही थी- बुधना के सपने से अधिक कीमत तो इस नक् फूल का नहीं है।
उसने अपने नाक से नकफुल को काफी प्रयास से निकाली और साड़ी से उसे अच्छी तरह पोंछकर चमकाई, चम्-चमाते नक् फूल को कुछ देर तक ध्यान से एकटक देखती रही... फिर उसे गड्ढे में रखे ईंट पर रख कर सीमेंट-बालू के मिश्रण और दूसरी ईंट को रख कर उद्घाटन प्रक्रिया को पूरा किया।
बुधना के सपने के साथ उसने इस नकफुल के जरिये खुद को को भी इस सपने का हिस्सा बना ली थी।
क्या उसकी दो बूंद आंशु भी उस नक् फूल के साथ उद्घाटन के नयी ईंट पर गिरा था....?
लेकिन हाँ.... बुधना का सपना तो पूरा हो ही गया था।

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