Saturday, December 4, 2010

छोटी कहानियां

अस्सी नब्बे के दसक में एक पत्रिका आती थी "सारिका" नाम की। पाक्षिक। फिर सायद मासिक और फिर गायब। इस साहित्यिक पत्रिका को जिसने भी पढ़ा है उसे इसकी कमी आज भी महसूस होता होगा। बीस वर्ष पुराने कुछ सारिका आज भी मेरे पास है। मैं आज भी दावे के साथ कहा सकता हूँ की सारिका के बाद उसके समकक्ष कोई दूसरी साहित्यिक पत्रिका फिर देखने को नहीं मिला। क्यों?
कई कारन हो सकते हैं - आम जनता को साहित्य से लगाव कम होना। पाठ्यक्रम में बदलाव होना। साहित्य के जरिये छोटी छोटी कहानियों के माध्यम से आने वाले समाज की कटु तश्विरों के सच से सामना करने का सहस काटने ही लोगो में होता है। इसलिए भी छोटी कहानियों का संसार और छोटी होता जा रहा है।
कितने कम खर्च में कितनी अछे अछे लेखकों की कहानी पढने को मिल जाया करता था। अब वोह दिन कहाँ।
ज्ञानोदय कथादेश कहानियां इत्यादि पत्रिकाएं अभी अभी भी कुछ सीमा तक ही सही छोटी कहानियों के संसार को जिन्दा रखने में सहायक हो रहा है लेकिन पाठक वर्ग की कमी के कारन या सर्कुलेसन ठीक से नहीं होने के कारन भी इन पत्रिकायों का बिक्री कम ही होता है। अक्सर मुझे इन पत्रिकायों को खरीदते समय दुकानदार अजीब निगाहों से अपनी तरफ देखते पाया है। जैसे चलो अभी अभी इसको पढने वाले लोग हैं। पूछने पर कहता है की क्या बोले साहब पञ्च पिस लाया था अभी भी आपको देने के बाद दो पिस पड़ा हुआ है। महिना तो ख़तम होने को आया। अब अगले महीने तिन पिस ही उठायूँगा।
ऐसा क्यों हो रहा है?

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