Wednesday, December 22, 2010

वेचारा भकुआ

- जरुरत से ज्यादा सीधा सादा कोई व्यक्ति, जो जाने-अनजाने, मनुष्य तो क्या किसी जानवर या पेड़ पौधे का भी अहित करने के सम्बन्ध में सोंच भी नहीं सकता हो, हमेशा हर किसी को मदद करने के लिए तैयार रहे, और खुद पर होते हुए सभी तरह के अन्याय को चुपचाप सहन करता रहे को हमारे समाज में वेचारा ही कहा जाता है
- इसके विपरीत जो व्यक्ति अपने चालाकी और कैयांपन से औरों को मुर्ख बनाकर अपने सभी काम करवा लेता हो को बुध्धिमान, होशियार कहा जाता है
- नानावती गावं के रामदीन और दीनदयाल ऐसे ही दो विपरीत स्वभाव वाले सगे भाई थे
- दीनदयाल उर्फ़ दीनु गावं के सभी का बिन वेतन का नौकर थाचाहे तीन कोष दूर बाजार से कोई सामान लाना हो या दवाएं, मवेशियों का चारा लाना हो या जंगल में चरने गए गाय-बकरियों को लौटकर सबके घर-घर तक पहुचाना हो- सभी कामों के लिए दीनू हाजिर रहताइन कामों के साथ-साथ वह गावं के आस-पास के पेड़-पौधों, चिड़ियों का देखभाल भी करता रहताउनसे बातें भी करता रहता था
- कोईं माने या माने, मनुष्य भले ही पेड़-पौधों, जानवरों और पक्षियों की भाषा नहीं समझता हो, लेकिन ये सभी किसी विशेष मनुष्य की प्यार और संवेदना की भाषा अच्छी तरह समझ सकता है
- इसलिए दीनू की मानवता की भाषा वे सभी समझते थे। पर गावं के लोग उसे 'भकुवा' कह कर ही पुकारते थे। जवान होते-होते दीनू अपना असली नाम भी भूलने लगा था। कोई अनजान व्यक्ति उसे उसका नाम पूछने पर वह अपना नाम 'भकुवा' ही कहता था। क्योंकि अब वह इसी नाम का अभ्यस्त जो हो गया था।
- रामदीन विवाहित था। उसके चार बच्चे थे। तीन बेटियां और एक बेटा। खेती-बारी का सारा काम दोनों भाई मिल कर ही करते थे। फसलों को बेच कर जो धन आता था उसे वह अपने नाम से बैंक में रखता था। भैया-भाभी का दीनू इतनी अधिक इज्जत करता था की इस सम्बन्ध में उसने कभी भी भैया या भाभी से कोई सवाल-जवाब नहीं करता था। उन दोनों के पिता स्वर्गवासी हो चुके थे। माँ अभी जीवित थी।
- घर के सभी कामों को करते हुए ही वह खेती-बारी के काम में अपने भैया को सहायता करता रहता था। अपने भतीजा-भतीजी के साथ-साथ वह गावं के सभी बच्चों का प्यारा चाचा था। न जाने कितने बच्चे उसके गोद में खेलते हुए बड़े हो गए थे।
- इन्ही में से एक थी बैजनाथ जी के चार वर्ष की बेटी यमुना। दीनू का लगाव सबसे अधिक उसी से था, क्योंकि वह जन्म से ही अंधी थी। बैजनाथ जी का घर दीनू के घर के पास ही था। रोज सुबह और शाम दीनू उसे गावं के पास ही बहती हुई नदी के किनारे सैर करवाने ले जाता था। रामदीन और दीनू का कोई बहन नहीं था, वैसे बहन नहीं रहने के कारन रामदीन को तो कोई फर्क नहीं पड़ता था, लेकिन भाई दूज और राखी के पर्वों पर दीनू जरुर उदास रहता था। दीनू की बहन की कमी यमुना ने ही पूरा कर दिया था। पांच वर्ष की उम्र से ही यमुना दीनू भैया के हांथों में राखी बंधती और भाई दूज में उसे टिका लगाती आ रही थी। इन दोनों भाई-बहनों का प्यार पुरे गावं में आदर्श के रूप में देखा जाता था।
- रामदीन की पत्नी भागमंती जब इस घर में बहु होकर आई थी, उस समय दीनू दस-बारह साल का रहा होगा। वह गावं के पाठशाला में चौथी में पढ़ रहा था। नई भौजी की प्रेम भरी बातें कुछ ही दिनों में उसे सम्मोहित कर दिया था। उनकी सेवा और आदेशों का पालन करते हुए कब उसकी पढाई छुट गया, और कब वह भैया-भाभी का जर खरीद गुलाम बन कर रह गया, उसे खुद भी याद नहीं ।
- घर पर उसकी और उसके माँ की स्तिथि लगभग एक जैसा ही था। सरकार के 'काम के बदले अनाज' कार्यक्रम जैसा ही उन दोनों को भी काम के बदले चार वक़्त का भोजन मिल जाया करता था, पर घर के किसी भी मामले में बात करने का अधिकार उन्हें नहीं था। उन्हें तो क्या, घर के तथाकथित मालिक रामदीन को भी नहीं। सारे निर्णय और आदेश भागमंती के ही होते थे।
- इन दिनों माँ जी को दीनू के भबिष्य की चिंता सता रही थी। आगामी दिनों में बहु का वर्ताव दीनू के प्रति कैसा रहेगा इसका अंदाजा वह कर पा रहीं थी। इसलिए जीवित रहते ही वे दीनू का घर बसाना चाहती थीं। लेकिन इसके लिए भागमंती का अनुमति जरुरी था।
- दस-ग्यारह वर्षों में ही चार बच्चों की माँ बनकर भागमंती काफी कमजोर हो गयी थी, इन दिनों वह अक्सर बीमार रहती थी,
चार बच्चों की माँ, भागमंती विवाह के बाद महीना- छः महीना तो सुशील और आँगाकारी ही थी, पर जैसे-जैसे दिन बीतते गए, बेटियां बड़ी होती गयी, वह भबिष्य की चिंता में उसे सँवारने में लग गयी।
- दीनू को पूरी तरह जायदाद से बेदखल करके रामदीन को वह मालिक बनाना चाहती थी। लेकिन गावं के लोगों के आँखों में भी धूल झोंकना था, इसलिए एक योजना के तहत आगे बढ़ना था।
- कई दिनों से सासु माँ भागमंती से दीनू की शादी के सम्बन्ध में बात करना चाहती थी, लेकिन बहु केवल दोनों शाम उनके पास खाना परोसने के समय ही आती थी, और उस समय उसके चेहरे पर जो भाव होते थे.... माँ जी को उससे बातें करने की हिम्मत नहीं होती थी। फिर भी एक दिन उन्होंने साहस जुटाकर बहु से कहा- " बहु, कुछ देर मेरे पास बैठ तो लो, कितनी थकी हुई दीख रही हो"
- भागमंती को सास की बातें सुन कर आश्चर्य तो हुआ, फिर भी वह जानती और मन ही मन मानती भी थी की गावं के दुसरे सासों की तुलना में उसकी सास उसे बेटी जैसा ही प्यार दिया था, क्योंकि उनकी कोई बेटी नहीं थी। कुछ देर के लिए उसके मन में सास के प्रति ममता जाग उठी-" हाँ, माँ जी, मन तो करता है की आप के पास कुछ देर बैठकर बातें करूँ, लेकिन गृहस्थी के कामों से इतनी थक जाती हूँ की चाहकर भी आ नहीं पाती"
दीनू तो अब जवान हो गया है, दिन भर इधर-उधर घूमता रहता है, वैसे बेटी तुम तो उसका ख्याल रखते ही हो, लेकिन कब तक तुम उसका देख-भाल करती रहोगी? देख रही हूँ ,की इन दिनों तुम्हारा स्वास्थ भी ठीक नहीं रहता, कितनी गोरी और भरा-भरा शारीर था तुम्हारा ! इसलिए मैं कह रही थी की


आज इतना ही। आगे फिर कभी। शुभ रात्री।

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